zaat ke karb ko lafzon men dabaye rakha | ज़ात के कर्ब को लफ़्ज़ों में दबाए रक्खा

  - Rafia Shabnam Abidi
ज़ातकेकर्बकोलफ़्ज़ोंमेंदबाएरक्खा
मेज़परतेरीकिताबोंकोसजाएरक्खा
तूनेइकशामजोआनेकाकियाथावा'दा
मैंनेदिन-रातचराग़ोंकोजलाएरक्खा
किससलीक़ेसेख़यालोंकोज़बाँदेदेकर
मुझकोउसशख़्सनेबातोंमेंलगाएरखा
मैंवोसीताकिजोलछमनकेहिसारोंमेंरही
हमवोजोगीकिअलखफिरभीजगाएरक्खा
शायदजाएकिसीरोज़वोसज्दाकरने
इसीउम्मीदपेआँचलकोबिछाएरक्खा
चूड़ियाँरखसकींमेरीनमाज़ोंकाभरम
फिरभीहाथोंकोदु'आओंमेंउठाएरक्खा
जानेक्यूँँगईफिरयादउसीमौसमकी
जिसने'शबनम'कोहवाओंसेबचाएरक्खा
  - Rafia Shabnam Abidi
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