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Rachit Sonkar
ishq markar bhi kam nahin hota
ishq markar bhi kam nahin hota | इश्क़ मरकर भी कम नहीं होता
- Rachit Sonkar
इश्क़
मरकर
भी
कम
नहीं
होता
क़ब्र
पर
हम
दिया
जला
रहे
हैं
- Rachit Sonkar
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उस
के
फ़रोग़-ए-हुस्न
से
झमके
है
सब
में
नूर
शम-ए-हरम
हो
या
हो
दिया
सोमनात
का
Meer Taqi Meer
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धूप
के
एक
ही
मौसम
ने
जिन्हें
तोड़
दिया
इतने
नाज़ुक
भी
ये
रिश्ते
न
बनाये
होते
Waseem Barelvi
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ये
शुक्र
है
कि
मिरे
पास
तेरा
ग़म
तो
रहा
वगर्ना
ज़िंदगी
भर
को
रुला
दिया
होता
Gulzar
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कुछ
नज़र
आता
नहीं
उस
के
तसव्वुर
के
सिवा
हसरत-ए-दीदार
ने
आँखों
को
अंधा
कर
दिया
Haidar Ali Aatish
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आज
तो
दिल
के
दर्द
पर
हँस
कर
दर्द
का
दिल
दुखा
दिया
मैं
ने
Zubair Ali Tabish
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तिरे
बग़ैर
अजब
बज़्म-ए-दिल
का
आलम
है
चराग़
सैंकड़ों
जलते
हैं
रौशनी
कम
है
Shakeel Badayuni
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ग़म-ए-ज़माना
ने
मजबूर
कर
दिया
वर्ना
ये
आरज़ू
थी
कि
बस
तेरी
आरज़ू
करते
Akhtar Shirani
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लो
आज
हमने
तोड़
दिया
रिश्ता-ए-उम्मीद
लो
अब
कभी
गिला
न
करेंगे
किसी
से
हम
Sahir Ludhianvi
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तन्हाई
के
हुजूम
में
वो
एक
तेरी
याद
जैसे
अँधेरी
रात
में
जलता
हुआ
दिया
Sagheer Lucky
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जो
ज़हर
पी
चुका
हूँ
तुम्हीं
ने
मुझे
दिया
अब
तुम
तो
ज़िन्दगी
की
दुआएँ
मुझे
न
दो
Ahmad Faraz
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तेरी
यादों
को
भुलाएँ
कैसे
मलबा
यादों
का
जलाएँ
कैसे
कितना
भारी
है
बताएँ
कैसे
इश्क़
का
बोझ
उठाएँ
कैसे
जागते-जागते
कट
जाती
है
रातों
में
ख़ुद
को
सुलाएँ
कैसे
हाथ
लग
ही
गई
मेरी
माँ
के
तेरी
तस्वीर
छुपाएँ
कैसे
इक
उदासी
हैं
हमारे
भीतर
हँसने
वालो
को
दिखाएँ
कैसे
तेरी
तस्वीर
हटा
दी
माँ
ने
कमरा
अब
अपना
सजाएँ
कैसे
जान
बसती
है
अभी
भी
इस
में
तेरी
तस्वीर
जलाएँ
कैसे
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Rachit Sonkar
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मुझको
उसने
इस
तरह
छोड़ा
रचित
जैसे
मामूली
सी
कोई
बात
हो
Rachit Sonkar
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मुफ़लिसी
में
ऐसी
हालत
हो
गई
है
मेरी
मर
जाने
की
सूरत
हो
गई
है
सोचता
था
छूट
जाएगी
किसी
दिन
पर
उदासी
मेरी
आदत
हो
गई
है
दोस्त
मिट्टी
डाल
के
जाते
हैं
ऐसे
ज़ीस्त
जैसे
क़ब्र
की
छत
हो
गई
है
पहले
जो
सीलन
मेरी
दीवार
पर
थी
अब
मेरे
चेहरे
की
रंगत
हो
गई
है
मैंने
कल
देखा
था
उस
को
घर
के
बाहर
और
भी
वो
ख़ूब-सूरत
हो
गई
है
डाँटते
हैं
उल्टे
वो
माता
पिता
को
बच्चों
की
अब
इतनी
हिम्मत
हो
गई
है
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Rachit Sonkar
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नींद
उस
रात
मुझको
नहीं
आई
थी
जब
तेरे
हिज्र
ने
चोट
पहुँचाई
थी
पूछा
जब
माँ
ने
बेटा
तू
क्यूँ
रो
रहा
तब
हक़ीक़त
ज़माने
की
बतलाई
थी
मैं
तुझे
जान
से
मार
सकता
न
था
इसलिए
तेरी
तस्वीर
दफ़नाई
थी
तू
ने
देखा
नहीं
था
मुझे
ग़ौर
से
मैं
वहाँ
था
जहाँ
तेरी
परछाई
थी
अपने
कमरे
में
जा
के
जो
देखा
'रचित'
फैली
चारो
तरफ़
सिर्फ़
तन्हाई
थी
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Rachit Sonkar
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ज़रा-ज़रा
सा
मैं
मर
रहा
हूँ
तुम्हारे
दिल
से
उतर
रहा
हूँ
क़सम
तो
खाई
थी
मैने
फिर
भी
मैं
उसके
दर
से
गुज़र
रहा
हूँ
कोई
तो
मुट्ठी
में
बाँधे
मुझको
कि
रेत
जैसा
बिखर
रहा
हूँ
तुम्हीं
हो
ख़ुशबू
तुम्हीं
फ़ज़ा
हो
मैं
तुम
सेे
मिल
कर
निखर
रहा
हूँ
हमेशा
सच
ही
कहाँ
है
मैंने
इसी
लिए
मैं
अखर
रहा
हूँ
मिली
नहीं
है
नज़र
अभी
तक
मैं
तुम
सेे
मिलने
को
मर
रहा
हूँ
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Rachit Sonkar
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