shaam ajeeb shaam thii jis men koi ufuk na tha | शाम अजीब शाम थी जिस में कोई उफ़क़ न था

  - Qamar Jameel
शामअजीबशामथीजिसमेंकोईउफ़क़था
फूलभीकैसेफूलथेजिनकोसुख़नकाहक़था
यारअजीबयारथाजिसकेहज़ारनामथे
शहरअजीबशहरथाजिसमेंकोईतबक़था
हाथमेंसबकेजिल्दथीजिसकेअजीबरंगथे
जिसपेअजीबनामथेऔरकोईवरक़था
जैसेअदमसेआएहोंलोगअजीबतरहके
जिनकालहूसफ़ेदथाजिनकाकलेजाशक़था
जिनकेअजीबतौरथेजिनमेंकोईकिरनथी
जिनकेअजीबदर्सथेजिनमेंकोईसबक़था
लोगकटेहुएइधरलोगपड़ेहुएउधर
जिनकोकोईअलमथाजिनकोकोईक़लक़था
जिनकाजिगरसियाहुआजिनकालहूबुझाहुआ
जिनकारफ़ूकियाहुआचेहराबहुतअदक़था
कैसातिलिस्मीशहरथाजिसकेतुफ़ैलरातभी
मेरेलहूमेंगर्दथीआईना-ए-शफ़क़था
  - Qamar Jameel
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