khatm shab qissa-e-mukhtasar na hui | ख़त्म शब क़िस्सा-ए-मुख़्तसर न हुई

  - Qamar Jalalvi
ख़त्मशबक़िस्सा-ए-मुख़्तसरहुई
शम्अ'गुलहोगईसहरहुई
रू-ए-शबनमजलाजोघरमेरा
फूलकीकमहँसीमगरहुई
हश्रमेंभीवोक्यामिलेंगेहमें
जबमुलाक़ातउम्र-भरहुई
आईनादेखकरयेकीजिएशुक्र
आपकोआपकीनज़रहुई
सबथेमहफ़िलमेंउनकीमहव-ए-जमाल
एककोएककीख़बरहुई
सैंकड़ोंरातकेकिएवा'दे
उनकीरातआजतक'क़मर'हुई
  - Qamar Jalalvi
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