KHud ki khaatir na zamaane ke li.e zinda hooñ | ख़ुद की ख़ातिर न ज़माने के लिए ज़िंदा हूँ

  - Qamar Iqbal
ख़ुदकीख़ातिरज़मानेकेलिएज़िंदाहूँ
क़र्ज़मिट्टीकाचुकानेकेलिएज़िंदाहूँ
किसकोफ़ुर्सतजोमिरीबातसुनेज़ख़्मगिने
ख़ाकहूँख़ाकउड़ानेकेलिएज़िंदाहूँ
लोगजीनेकेग़रज़-मंदबहुतहैंलेकिन
मैंमसीहाकोबचानेकेलिएज़िंदाहूँ
रूहआवाराभटकेयेकिसीकीख़ातिर
सारेरिश्तोंकोभुलानेकेलिएज़िंदाहूँ
ख़्वाबटूटेहुएरूठेहुएलम्हेवो'क़मर'
बोझकितनेहीउठानेकेलिएज़िंदाहूँ
  - Qamar Iqbal
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy