kahii ye dard ka dhaaga bhi yuñ suljhta hai | कहीं ये दर्द का धागा भी यूँँ सुलझता है

  - Qamar Iqbal
कहींयेदर्दकाधागाभीयूँँसुलझताहै
गिरहजोखोलेंतोदिलऔरभीउलझताहै
वोएकबातजोदिलमेंहैमेरेउसकेलिए
ज़बाँसेकहतानहींवोमगरसमझताहै
मैंतेरीआँखोंकीयेप्यासकिसतरहदेखूँ
मिरेवजूदमेंबादलकोईगरजताहै
अजीबचीज़हैयेख़ूबी-ए-ख़ुतूत-ए-बदन
कोईलिबासहोउसकेबदनपेसजताहै
येरातऔरयेडसतीहुईसीतन्हाई
लहूकासाज़'क़मर'तन-बदनमेंबजताहै
  - Qamar Iqbal
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