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Parvez Shaikh
khushi par hamaara bhi haq tha magar yuñ
khushi par hamaara bhi haq tha magar yuñ | ख़ुशी पर हमारा भी हक़ था मगर यूँँ
- Parvez Shaikh
ख़ुशी
पर
हमारा
भी
हक़
था
मगर
यूँँ
ग़मों
ने
नहीं
दी
इजाज़त
कभी
भी
- Parvez Shaikh
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न
जाने
ख़त्म
हुई
कब
हमारी
आज़ादी
तअल्लुक़ात
की
पाबंदियाँ
निभाते
हुए
Azhar Iqbal
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ये
मैंने
कब
कहा
कि
मेरे
हक़
में
फ़ैसला
करे
अगर
वो
मुझ
से
ख़ुश
नहीं
है
तो
मुझे
जुदा
करे
मैं
उसके
साथ
जिस
तरह
गुज़ारता
हूँ
ज़िंदगी
उसे
तो
चाहिए
कि
मेरा
शुक्रिया
अदा
करे
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Tehzeeb Hafi
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किसी
बे-वफ़ा
से
बिछड़
के
तू
मुझे
मिल
गया
भी
तो
क्या
हुआ
मेरे
हक़
में
वो
भी
बुरा
हुआ
मेरे
हक़
में
ये
भी
बुरा
हुआ
Mumtaz Naseem
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हमेशा
इक
दूसरे
के
हक़
में
दु'आ
करेंगे
ये
तय
हुआ
था
मिलें
या
बिछड़ें
मगर
तुम्हीं
से
वफ़ा
करेंगे
ये
तय
हुआ
था
Shabeena Adeeb
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मेरा
क़ातिल
ही
मेरा
मुंसिफ़
है
क्या
मिरे
हक़
में
फ़ैसला
देगा
Sudarshan Fakir
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देख
ज़िंदाँ
से
परे
रंग-ए-चमन
जोश-ए-बहार
रक़्स
करना
है
तो
फिर
पाँव
की
ज़ंजीर
न
देख
Majrooh Sultanpuri
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कुछ
रिश्तों
में
दिल
को
आज़ादी
नइँ
होती
कुछ
कमरों
में
रौशनदान
नहीं
होता
है
Vikram Gaur Vairagi
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ख़्वाबों
की
ता'बीर
बनी
है
इक
लड़की
मेरे
मन
की
हीर
बनी
है
इक
लड़की
दुनिया
तुझ
को
कब
का
छोड़
चुके
होते
पैरों
की
ज़ंजीर
बनी
है
इक
लड़की
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Vikas Sahaj
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न
खाओ
क़स
में
वग़ैरा
न
अश्क
ज़ाया'
करो
तुम्हें
पता
है
मेरी
जान
हक़-पज़ीर
हूँ
मैं
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Amaan Haider
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मोहब्बत
की
तो
कोई
हद,
कोई
सरहद
नहीं
होती
हमारे
दरमियाँ
ये
फ़ासले,
कैसे
निकल
आए
Khalid Moin
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ये
मत
सोचना
अब
मुहब्बत
नहीं
है
उसे
बस
बताने
की
हिम्मत
नहीं
है
वफ़ा
माँगता
क्यूँ
फिरुँ
हर
किसी
से
मिरे
दिल
में
इतनी
भी
ग़ुर्बत
नहीं
है
तिरे
मन
में
जब
आए
तब
काम
करना
मुझे
अब
किसी
की
ज़रूरत
नहीं
है
मिरे
यार
कहते
हैं
'परवेज़'
मुझ
को
मुझे
माल-ओ-ज़र
की
ज़रूरत
नहीं
है
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Parvez Shaikh
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देखना
है
मेरी
वफ़ा
का
रंग
देख
ले
हाथ
पर
हिना
का
रंग
ये
तकब्बुर
ये
नाज़
नख़रों
से
तेरे
चेहरे
पे
हैं
अना
का
रंग
साँवला
चेहरा
नील-गूँ
आँखें
और
उस
पर
तेरी
अदा
का
रंग
नाज़
करती
हैं
जिस
पे
हूर-ओ-मलक
तुझ
पे
उतरा
है
वो
हया
का
रंग
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Parvez Shaikh
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बात
इक
तरफ़ा
अच्छी
होती
नहीं
हाल
हम
सेे
भी
पूछिए
तो
कभी
Parvez Shaikh
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सब्र
कर
सब्र
की
घड़ी
है
अभी
इतनी
मुश्किल
से
जो
मिली
है
अभी
वक़्त
से
पहले
मौत
अच्छी
नहीं
ज़िंदगी
सामने
पड़ी
है
अभी
आँख
रंजूर
हो
गई
मेरी
उस
ने
जाने
की
ज़िद
गढ़ी
है
अभी
बाद
तेरे
कोई
नहीं
होगा
तू
मिरी
आख़िरी
ख़ुशी
है
अभी
तू
भी
'परवेज़'
को
समझ
न
सका
तंज़
तेरा
भी
लाज़मी
है
अभी
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Parvez Shaikh
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याद
में
तेरी
नहीं
जो
कभी
सोया
है
मैं
हूँ
अपने
ख़्वाबों
में
तुझे
जिसने
पिरोया
है
मैं
हूँ
Parvez Shaikh
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