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Abuzar kamaal
ghazlein wazlen kahtaa jaa.e
ghazlein wazlen kahtaa jaa.e | ग़ज़लें वज़लें कहता जाए
- Abuzar kamaal
ग़ज़लें
वज़लें
कहता
जाए
उसको
धुन
में
गाया
जाए
राजा
ज़िंदा
रहे
आख़िर
तक
जान
से
चाहे
घोड़ा
जाए
दूरी
बनाना
आसाँ
होगा
बीच
में
मज़हब
लाया
जाए
दुनिया
से
मैं
तब
जाऊँगा
पहले
रोना
धोना
जाए
मुझको
सुनने
वालों
बोलो
उसको
कितना
सोचा
जाए
आज
रहे
घर
वाला
घर
पे
जॉब
पे
बाहर
वाला
जाए
दूर
निशाना
है
वो
जितना
तीर
उतना
ही
गहरा
जाए
मुझ
सेे
पहले
इंटरव्यूँँ
को
मेरे
बराबर
वाला
जाए
हाथ
वो
प्रॉपर्टी
आएगी
दुनिया
से
कब
बूढ़ा
जाए
नज़रें
मिलने
से
धोखे
पर
शर्म
हया
का
पर्दा
जाए
सर्वे
पे
नीची
बस्ती
को
इंसाँ
कोई
ऊँचा
जाए
दूर
अगर
जो
अपना
जाए
आँखें
जाए
सपना
जाए
ग़ज़लें
सुनने
से
क्या
होगा
शायर
को
भी
समझा
जाए
दिल
रोएगा
जाने
वाले
वक़्त
बिछड़ते
रोया
जाए
- Abuzar kamaal
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हम
को
दिल
से
भी
निकाला
गया
फिर
शहरस
भी
हम
को
पत्थर
से
भी
मारा
गया
फिर
ज़हरस
भी
Azm Shakri
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देखें
क़रीब
से
भी
तो
अच्छा
दिखाई
दे
इक
आदमी
तो
शहर
में
ऐसा
दिखाई
दे
Zafar Gorakhpuri
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सुना
है
लोग
उसे
आँख
भर
के
देखते
हैं
सो
उस
के
शहर
में
कुछ
दिन
ठहर
के
देखते
हैं
Ahmad Faraz
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'इंशा'-जी
उठो
अब
कूच
करो
इस
शहर
में
जी
को
लगाना
क्या
वहशी
को
सुकूँ
से
क्या
मतलब
जोगी
का
नगर
में
ठिकाना
क्या
Ibn E Insha
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पत्थर
के
ख़ुदा
पत्थर
के
सनम
पत्थर
के
ही
इंसाँ
पाए
हैं
तुम
शहर-ए-मोहब्बत
कहते
हो
हम
जान
बचा
कर
आए
हैं
Sudarshan Fakir
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'अल्वी'
ये
मो'जिज़ा
है
दिसम्बर
की
धूप
का
सारे
मकान
शहर
के
धोए
हुए
से
हैं
Mohammad Alvi
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बंदा
किसी
के
साथ,
ख़ुदा
हो
किसी
के
साथ
जाने
पराए
शहर
में
क्या
हो
किसी
के
साथ
Mueed Mirza
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तुझे
कैसे
इल्म
न
हो
सका
बड़ी
दूर
तक
ये
ख़बर
गई
तिरे
शहर
ही
की
ये
शाएरा
तिरे
इंतिज़ार
में
मर
गई
Mumtaz Naseem
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जगह
की
क़ैद
नहीं
थी
कोई
कहीं
बैठे
जहाँ
मक़ाम
हमारा
था
हम
वहीं
बैठे
अमीर-ए-शहर
के
आने
पे
उठना
पड़ता
है
लिहाज़ा
अगली
सफ़ों
में
कभी
नहीं
बैठे
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Mehshar Afridi
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शब
की
हवा
से
हार
गई
मेरे
दिल
की
आग
यख़-बस्ता
शहर
में
कोई
रद्द-ओ-बदल
न
था
Qaisar-ul-Jafri
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किसके
ख़्वाबों
में
खो
गए
हैं
इन
हालातों
में
खो
गए
हैं
कोई
आए
तलाशे
उनको
मेरी
बातों
में
खो
गए
हैं
दिन
में
तुम्हें
मिलना
नईं
होता
और
अब
रातों
में
खो
गए
हैं
आँसू
समझ
के
निकाला
जिस
ने
उस
के
ही
चश्मों
में
खो
गए
हैं
दीपक
ढूंढ़ने
निकले
थे
जो
ख़ुद
ही
ताकों
में
खो
गए
हैं
इक
चेहरा
पढ़ने
आए
थे
हम
भी
किताबों
में
खो
गए
हैं
खट्टे
आम
तो
तोड़
लिए
है
मीठे
पेड़ों
में
खो
गए
हैं
सबको
दरिया
से
मिलना
है
सब
ही
लहरों
में
खो
गए
है
आप
कमाल
पे
ध्यान
लगाए
आप
तो
लफ़्ज़ों
में
खो
गए
हैं
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Abuzar kamaal
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किस
को
है
परवाह
यहाँ
पे
गाय
की
बस
पड़ी
है
दूध
की
और
चाय
की
अब
कहानी
चलती
हैं
चारों
तरफ़
और
कहीं
हाए
कहीं
पे
बाय
की
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Abuzar kamaal
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कोई
ज़िन्दगी
काटता
है
किसी
पे
सफलता
फ़िदा
है
Abuzar kamaal
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आप
मुझको
देखना
हुस्न-ए-एहतियात
से
देख
लेना
आपकी
निगाह
देखी
जाएगी
Abuzar kamaal
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ऐसे
चाहो
मुझे
के
हद
कर
दो
वरना
ये
सिलसिला
ही
रद्द
कर
दो
साँस
तकलीफ़
में
मैं
लेती
हूँ
साँस
लेने
में
तुम
मदद
कर
दो
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Abuzar kamaal
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