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Abuzar kamaal
kis ko hai parwaah yahaañ pe gaay ki
kis ko hai parwaah yahaañ pe gaay ki | किस को है परवाह यहाँ पे गाय की
- Abuzar kamaal
किस
को
है
परवाह
यहाँ
पे
गाय
की
बस
पड़ी
है
दूध
की
और
चाय
की
अब
कहानी
चलती
हैं
चारों
तरफ़
और
कहीं
हाए
कहीं
पे
बाय
की
- Abuzar kamaal
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सिगरेट
की
शक्ल
में
कभी
चाय
की
शक्ल
में
इक
प्यास
है
कि
जिसको
पिए
जा
रहे
हैं
हम
Ameer Imam
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चाय
के
बारे
में
कोई
राय
मत
दो
यार
मुझको
बात
समझो
इश्क़
सब
सेे
पूछकर
होता
नहीं
है
Neeraj Neer
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ठंडी
चाय
की
प्याली
पी
के
रात
की
प्यास
बुझाई
है
Rais Farog
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हम
इक
ही
लौ
में
जलाते
रहे
ग़ज़ल
अपनी
नई
हवा
से
बचाते
रहे
ग़ज़ल
अपनी
दरअस्ल
उसको
फ़क़त
चाय
ख़त्म
करनी
थी
हम
उसके
कप
को
सुनाते
रहे
ग़ज़ल
अपनी
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Zubair Ali Tabish
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ज़िक्र
तुम्हारा
बहुत
ज़रूरी
इन
ग़ज़लों
में
जानेमन
चाय
बिना
अदरक
को
डाले
अच्छी
थोड़ी
बनती
है
Tanoj Dadhich
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सिगरटें
चाय
धुआँ
रात
गए
तक
बहसें
और
कोई
फूल
सा
आँचल
कहीं
नम
होता
है
Wali Aasi
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इतनी
दिलकश
थी
गुफ़्तगू
उसकी
चाय
का
कप
भी
सुन
रहा
था
उसे
Hashim Raza Jalalpuri
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एक
मुझे
ख़्वाब
देखने
के
सिवा
चाय
पीने
की
गंदी
आदत
है
Balmohan Pandey
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चाय
पीते
हैं
कहीं
बैठ
के
दोनों
भाई
जा
चुकी
है
ना
तो
बस
छोड़
चल
आ
जाने
दे
Ali Zaryoun
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चाय
की
प्याली
में
नीली
टेबलेट
घोली
सह
में
सह
में
हाथों
ने
इक
किताब
फिर
खोली
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Bashir Badr
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मुझे
आज
घर
जाना
होगा
न
पहचुँ
मगर
जाना
होगा
गली-दर-गली,
शहर-दर-शहर
पता
पूछकर
जाना
होगा
सही
रास्ता
ढूँढ़ने
को
यहाँ
से
किधर
जाना
होगा
ग़लत
ले
लिया
आपने
टर्न
इधर
से
उधर
जाना
होगा
अगर
ज़िन्दगी
चाहते
हो?
सो
तत्का़ल
मर
जाना
होगा
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Abuzar kamaal
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जो
घर,
गली,
शहर,
देश
खोया
ज़रूर
लेंगे
नए
रखो
नाम
हम
पुराना
ज़रूर
लेंगे
सुनो
कि
तुम
जितना
सह
सको
उतना
ज़ुल्म
करना
ये
याद
रखना,
के
हम
भी
बदला
ज़रूर
लेंगे
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Abuzar kamaal
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आई
उसकी
याद
अफ़सोस
ग़म,
मुबारकबाद,
अफ़सोस
ढ़ह
गई
कमज़ोर
बिल्डिंग
इश्क़-ए-बे-बुनियाद
अफ़सोस
सीखने
की
उम्र
में
तुम
बनते
हो
उस्ताद
अफ़सोस
क़ाबिले
ता'रीफ़
दीवान
शे'र
सब
बे-दाद
अफ़सोस
औरतों
की
ज़िन्दगी
भी
आदमी,
औलाद,
अफ़सोस
क्यूँ
नहीं
करते
मुझे
याद
इश्क़
की
फरियाद,
अफ़सोस
मेरे
घर
के
तीन
एड्रेस
ग़ाज़ियाबाद,
आद,
अफ़सोस
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Abuzar kamaal
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आप
मुझको
देखना
हुस्न-ए-एहतियात
से
देख
लेना
आपकी
निगाह
देखी
जाएगी
Abuzar kamaal
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बदल
न
जाना
ओ
दूर
रह
के
बदल
गया
ख़ुद
ये
बात
कह
के
खिलाफ़
आवाज़
तो
उठाती
मिला
भी
क्या
रोज़
मार
सह
के
जो
मिलनी
होगी
मिलेगी
मंज़िल
करो
मज़े
रास्ते
में
रह
के
डटा
रहा
गाँव
बाढ़ें
आई
चली
गईं
गाँव
गाँव
बह
के
ज़मीर
खोया
जो
लोग
गिर
गए
कोई
इमारत
खड़ी
थी
ढ़ह
के
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Abuzar kamaal
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