ajeeb rut hai darakhton ko be-zabaan dekhooñ | अजीब रुत है दरख़्तों को बे-ज़बाँ देखूँ

  - Parkash Fikri
अजीबरुतहैदरख़्तोंकोबे-ज़बाँदेखूँ
दयार-ए-शाममेंआहोंकामैंधुआँदेखूँ
चहारसम्तसेआईथीबर्फ़कीआँधी
कहींफूलरंगोंकीतितलियाँदेखूँ
यक़ीनउनकोदिलाऊँचमकतेसूरजका
हिसार-ए-शबमेंजोसह
मेंहुएमकाँदेखूँ
ज़मींकोतूनेडरायासदामसाइबसे
कभीतुझेभीहिरासाँआसमाँदेखूँ
लबोंपेजिसकेमुसलसलपुकारपानीकी
उसीकीआँखसेदरियाभीइकरवाँदेखूँ
लहू-लुहानतोकोईनज़रनहींआता
लहूमेंडूबीमगरसबकीउँगलियाँदेखूँ
हमारेअहदकेलोगोंकोक्याहुआ'फ़िक्री'
सभोंमेंबुझतीहुईआगकासमाँदेखूँ
  - Parkash Fikri
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