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Paras Angral
fazl ya maula aisa karo
fazl ya maula aisa karo | फ़ज़्ल या मौला ऐसा करो
- Paras Angral
फ़ज़्ल
या
मौला
ऐसा
करो
बंदे
को
फिर
से
बंदा
करो
ख़ुद
में
कब
तक
करोगे
जमा
वसवसे
तो
निकाला
करो
आते
परवाने
दिन
में
नहीं
शम्अ
दिन
में
जलाया
करो
जो
मिलो
बाद
मुद्दत
के
तुम
हाल
दो
बार
पूछा
करो
देखो
फिर
भर
न
जाए
कहीं
ज़ख़्म
पारस
ये
ताज़ा
करो
- Paras Angral
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आज
मैं
जो
घुटनों
पर
हूँ
मेरा
क़द
तुम
सेे
ऊँचा
है
Paras Angral
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पास
होना
उसका
काफ़ी
होता
है
यूँँही
तो
बस
जीना
काफ़ी
होता
है
हो
महल
गर
तो
भी
कम
पड़
जाता
है
रहने
को
इक
कमरा
काफ़ी
होता
है
ये
ज़रूरी
तो
नहीं
हासिल
भी
हो
चाँद
का
बस
दिखना
काफ़ी
होता
है
हँसने
को
तो
दुनिया
कम
पड़
जाती
है
रोने
को
इक
कंधा
काफ़ी
होता
है
ग़ैरों
पर
पारस
यक़ीं
हो
जाता
है
धोखे
को
इक
अपना
काफ़ी
होता
है
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Paras Angral
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बात
करता
हूँ
कभी
आवाज़
देता
हूँ
अपने
ख़्वाबों
को
नई
परवाज़
देता
हूँ
Paras Angral
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पूरी
नहीं
हो
पाती
है
कोई
ग़ज़ल
मिरी
मैं
नाम
तेरा
लिखके
क़लम
तोड़
देता
हूँ
Paras Angral
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फ़ज़्ल
या
मौला
ऐसा
करो
बंदे
को
फिर
से
बंदा
करो
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