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Paras Angral
baat karta hooñ kabhi awaaz deta hooñ
baat karta hooñ kabhi awaaz deta hooñ | बात करता हूँ कभी आवाज़ देता हूँ
- Paras Angral
बात
करता
हूँ
कभी
आवाज़
देता
हूँ
अपने
ख़्वाबों
को
नई
परवाज़
देता
हूँ
- Paras Angral
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आज
मैं
जो
घुटनों
पर
हूँ
मेरा
क़द
तुम
सेे
ऊँचा
है
Paras Angral
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न
जाने
उसने
क्या
यहाँ
गँवाया
था
वो
आह
जिसने
ये
मकाँ
जलाया
था
ये
जिस्म
मेरे
साथ
तो
रहा
मगर
जो
छोड़
के
गया
वो
मेरा
साया
था
जो
तुझ
सेे
बिछड़ा
तो
अयाँ
हुआ
मुझे
मुझे
तू
कितना
मेरे
पास
लाया
था
मैं
उस
सेे
पूछता
रहा
पता
मिरा
जिसे
मैं
दर
तक
अपने
लेके
आया
था
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Paras Angral
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गर
न
मेरी
आँखें
होती
क्या
मुझे
फिर
पैसा
दिखता
Paras Angral
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भूलने
में
जो
ज़माने
लगे
ख़्वाब
में
वो
लोग
आने
लगे
नज़रें
नहीं
मिल
रहीं
उनकी
अब
कुछ
है
जो
हम
सेे
छुपाने
लगे
बदली
है
रुत
तो
ये
आया
नज़र
पंछी
नए
घर
बसाने
लगे
वक़्त
के
धागे
से
सिलते
नहीं
ज़ख़्म
जो
दिल
पर
पुराने
लगे
देखना
था
बाग़ी
है
कौन
कौन
दोस्तों
को
आज़माने
लगे
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Paras Angral
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मैं
तुम्हें
ही
जानता
हूँ
कुछ
न
गर
मैं
मानता
हूँ
लाख
चेहरों
में
वो
इक
को
दूर
से
पहचानता
हूँ
और
तो
कोई
नहीं
पर
माँ
तुझे
रब
मानता
हूँ
जो
हक़ीक़त
में
नहीं
है
ख़्वाब
में
वो
जानता
हूँ
नाम
बेशक
लूँ
न
उसका
ख़ूनी
को
पहचानता
हूँ
सच
उसे
'पारस'
कहूँगा
दिल
में
तो
ये
ठानता
हूँ
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Paras Angral
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