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Paras Angral
aaj main jo ghutnon par hooñ
aaj main jo ghutnon par hooñ | आज मैं जो घुटनों पर हूँ
- Paras Angral
आज
मैं
जो
घुटनों
पर
हूँ
मेरा
क़द
तुम
सेे
ऊँचा
है
- Paras Angral
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साथ
बचपन
से
हुए
जो
बड़े
हैं
यार
हैं
दो
जो
अभी
भी
खड़े
हैं
कर
ली
है
ख़ामोशी
ही
मंज़ूर
अब
सौ
दफ़ा
इश्क़
में
ख़ुद
से
लड़े
हैं
तुम
जो
अब
खोज
रहे
हो
बाहर
हम
कहीं
अपने
ही
अंदर
पड़े
हैं
देखना
ग़ैरों
की
ओर
अब
'पारस'
तीर
अपने
यहाँ
ताने
खड़े
हैं
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Paras Angral
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फ़ज़्ल
या
मौला
ऐसा
करो
बंदे
को
फिर
से
बंदा
करो
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तुझे
भूल
जाने
से
डर
लगता
है
तिरे
पास
आने
से
डर
लगता
है
तुझे
आज़माने
से
डर
लगता
है
वो
झूठे
फ़साने
से
डर
लगता
है
नहीं
खोया
मैंने
अभी
तक
है
जो
उसी
को
ही
पाने
से
डर
लगता
है
तिरा
नाम
जिस
में
है
मैंने
लिया
ग़ज़ल
वो
सुनाने
से
डर
लगता
है
ये
सब
शहरस
मैं
उलझ
लूँ
मगर
तिरे
वो
फ़लाने
से
डर
लगता
है
तुझे
भूल
जाऊँ
ये
मुमकिन
है
पर
तिरे
ख़त
जलाने
से
डर
लगता
है
इसे
दफ़्न
रहने
दो
'पारस'
यहीं
वो
गुज़रे
ज़माने
से
डर
लगता
है
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गर
न
मेरी
आँखें
होती
क्या
मुझे
फिर
पैसा
दिखता
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पास
होना
उसका
काफ़ी
होता
है
यूँँही
तो
बस
जीना
काफ़ी
होता
है
हो
महल
गर
तो
भी
कम
पड़
जाता
है
रहने
को
इक
कमरा
काफ़ी
होता
है
ये
ज़रूरी
तो
नहीं
हासिल
भी
हो
चाँद
का
बस
दिखना
काफ़ी
होता
है
हँसने
को
तो
दुनिया
कम
पड़
जाती
है
रोने
को
इक
कंधा
काफ़ी
होता
है
ग़ैरों
पर
पारस
यक़ीं
हो
जाता
है
धोखे
को
इक
अपना
काफ़ी
होता
है
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Paras Angral
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