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Paras Angral
bhoolne men jo zamaane lage
bhoolne men jo zamaane lage | भूलने में जो ज़माने लगे
- Paras Angral
भूलने
में
जो
ज़माने
लगे
ख़्वाब
में
वो
लोग
आने
लगे
नज़रें
नहीं
मिल
रहीं
उनकी
अब
कुछ
है
जो
हम
सेे
छुपाने
लगे
बदली
है
रुत
तो
ये
आया
नज़र
पंछी
नए
घर
बसाने
लगे
वक़्त
के
धागे
से
सिलते
नहीं
ज़ख़्म
जो
दिल
पर
पुराने
लगे
देखना
था
बाग़ी
है
कौन
कौन
दोस्तों
को
आज़माने
लगे
- Paras Angral
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जब
कोई
देख
न
पाएगा
मुझे
दुनिया
में
तेरी
आँखों
में
दिखूँगा
कोई
जब
देखेगा
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मैं
इसी
सम्त
ही
तो
बैठा
हूँ
तेरी
जिस
सम्त
वापसी
होगी
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फ़ज़्ल
या
मौला
ऐसा
करो
बंदे
को
फिर
से
बंदा
करो
ख़ुद
में
कब
तक
करोगे
जमा
वसवसे
तो
निकाला
करो
आते
परवाने
दिन
में
नहीं
शम्अ
दिन
में
जलाया
करो
जो
मिलो
बाद
मुद्दत
के
तुम
हाल
दो
बार
पूछा
करो
देखो
फिर
भर
न
जाए
कहीं
ज़ख़्म
पारस
ये
ताज़ा
करो
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गर
न
मेरी
आँखें
होती
क्या
मुझे
फिर
पैसा
दिखता
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तेरे
होने
से
रौशनी
होगी
वर्ना
तो
दिन
में
तीरगी
होगी
ज़िन्दगी
जिस
तरह
हुई
रुख़्सत
उसकी
भी
कोई
बेबसी
होगी
मैं
इसी
सम्त
ही
तो
बैठा
हूँ
तेरी
जिस
सम्त
वापसी
होगी
तेरे
क़दमों
की
आहटें
अब
भी
इन
दरख़्तों
ने
रख
रखी
होगी
चुप
रहा
मैं
तो
बस
इसी
ख़ातिर
तू
समझ
लेगा
दोस्ती
होगी
तेरे
आने
का
वक़्त
क्या
देखें
ये
घड़ी
ख़ुद
ही
गिन
चुकी
होगी
और
तो
साथ
क्या
रहा
पारस
साथ
तेरे
तो
बेरुख़ी
होगी
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