nazar ko waqf-e-gham-e-intizaar kar na sake | नज़र को वक़्फ़-ए-ग़म-ए-इंतिज़ार कर न सके

  - Paikar Jafari
नज़रकोवक़्फ़-ए-ग़म-ए-इंतिज़ारकरसके
ख़ुदअपनीज़ातपेहमए'तिबारकरसके
नज़रउठीतोगुलोंतकहीरहगईमहदूद
नज़रकोमाइल-ए-रंग-ए-बहारकरसके
फ़रेब-ए-हुस्नसेइसकोक्यूँकरूँँता'बीर
ज़बाँसेकहतेरहेदिलसेप्यारकरसके
क़फ़समेंआयातोमौसमबहारकालेकिन
निगाह-ए-शौक़कोवक़्फ़-ए-बहारकरसके
हरीम-ए-नाज़केपर्देउठेमगर'पैकर'
जुनूँकेमारेहीख़ुदइंतिज़ारकरसके
  - Paikar Jafari
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy