pesh-e-manzar jo tamaashe the pas-e-manzar bhi the | पेश-ए-मंज़र जो तमाशे थे पस-ए-मंज़र भी थे

  - P P Srivastava Rind
पेश-ए-मंज़रजोतमाशेथेपस-ए-मंज़रभीथे
हमहीथेमाल-ए-ग़नीमतहमहीग़ारत-गरभीथे
आस्तीनोंमेंछुपाकरसाँपभीलाएथेलोग
शहरकीइसभीड़मेंकुछलोगबाज़ीगरभीथे
बर्फ़-मंज़रधूलकेबादलहवाकेक़हक़हे
जोकभीदहलीज़केबाहरथेवोअंदरभीथे
आख़िर-ए-शबदर्दकीटूटीहुईबैसाखियाँ
आड़े-तिरछेज़ाविएमौसमकेचेहरेपरभीथे
रातहमनेजुगनुओंकीसबदुकानेंबेचदीं
सुब्हकोनीलामकरनेकेलिएकुछघरभीथे
कुछबिला-उनवानरिश्तेअजनबीसरगोशियाँ
रतजगोंकेजश्नमेंज़ख़्मोंकेसौदागरभीथे
शब-परस्तोंकेनगरमेंबुत-परस्तीहीथी
वहशतेंथींसंग-ए-मरमरभीथाकारीगरभीथे
इसख़राबेमेंनएमौसमकीसाज़िशथीतो'रिंद'
लज़्ज़त-ए-एहसासकेलम्होंकेजलतेपरभीथे
  - P P Srivastava Rind
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