tira bulbul hooñ tujh gul ki qasam hai | तिरा बुलबुल हूँ तुझ गुल की क़सम है

  - Obaidullah Khan Mubtala
तिराबुलबुलहूँतुझगुलकीक़समहै
बिरहसूँमस्तहूँमुलकीक़समहै
रक़ीब-ए-रू-सियहखावेगाअबमार
मुझेतुझकालेकाकुलकीक़समहै
लिएदिलफिरतेहैंदौरज़ुलफ़में
मुझेउसकेतसलसुलकीक़समहै
करतूँबुल-हवसऊपरतलत्तुफ़
तिरेदिलकेताम्मुलकीक़समहै
ख़ुदाआख़िरकरेगाख़ुशमिरादिल
मुझेअपनेतवक्कुलकीक़समहै
नहींहोताहूँमिलनेसेंकभीसेर
तिरेमनकेतफ़ज़्ज़ुलकीक़समहै
रहग़ाफ़िलतूँअपने'मुबतला'सूँ
तुझेतेरेतग़ाफ़ुलकीक़समहै
  - Obaidullah Khan Mubtala
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