kabhi baatil ko haq aur haq ko ham baatil samjhte hain | कभी बातिल को हक़ और हक़ को हम बातिल समझते हैं

  - Naim Hamid Ali
कभीबातिलकोहक़औरहक़कोहमबातिलसमझतेहैं
मुराद-ए-अहल-ए-दिलकोसिर्फ़अहल-ए-दिलसमझतेहैं
दिल-ए-बे-मुद्दआहीमुद्दआ-ए-ज़ीस्तहैअपना
इसीबे-हासिलीकोज़ीस्तकाहासिलसमझतेहैं
येतेरानूरवोतेरामकाँदिलक्यानज़रक्याहै
नज़रकोहमनज़रसमझेदिलकोदिलसमझतेहैं
किनारोंपरजोउठतेहैंवोतूफ़ाँकोईक्याजाने
हमेंतोकम-नज़रआसूदा-ए-साहिलसमझतेहैं
यहीअपनाअक़ीदाहैकोईकुछभीकहेहमतो
ग़ज़लकहनाभीकार-ए-ख़ैरमेंदाख़िलसमझतेहैं
जिलामहसूसहोतीहै'नईम'आईना-ए-दिलपर
किसीकीहमनिगाह-ए-लुत्फ़कोशामिलसमझतेहैं
  - Naim Hamid Ali
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy