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Murari Mandal
dukhon ka bojh dhona laazmi hai
dukhon ka bojh dhona laazmi hai | दुखों का बोझ ढोना लाज़मी है
- Murari Mandal
दुखों
का
बोझ
ढोना
लाज़मी
है
अभी
बस
मौन
होना
लाज़मी
है
कोई
समझे
नहीं
तकलीफ़
को
जब
अकेले
छिप
के
रोना
लाज़मी
है
न
हम
में
कुछ
रहा
पहले
के
जैसा
हमारा
दूर
होना
लाज़मी
है
अभी
टूटा
है
दिल
ताज़ा
हमारा
अभी
ये
रोना
धोना
लाज़मी
है
तुम्हारा
इश्क़
पहला
है
ये
प्यारे
तुम्हारा
चैन
खोना
लाज़मी
है
अभी
शुरुआत
है
इस
ज़िंदगी
की
अभी
सपने
पिरोना
लाज़मी
है
- Murari Mandal
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आँख
की
बेबसी
दिल
का
डर
देखना
तुम
किसी
दिन
ग़रीबों
का
घर
देखना
Alankrat Srivastava
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मैं
उसे
वो
मुझको
समझाता
रहा
पर
त'अल्लुक़
फिर
भी
मुरझाता
रहा
Madan Mohan Danish
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भेज
देता
हूँ
मगर
पहले
बता
दूँ
तुझ
को
मुझ
से
मिलता
नहीं
कोई
मिरी
तस्वीर
के
बाद
Umair Najmi
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खड़ा
हूँ
आज
भी
रोटी
के
चार
हर्फ़
लिए
सवाल
ये
है
किताबों
ने
क्या
दिया
मुझ
को
Nazeer Baaqri
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इश्क़
में
तेरे
गँवा
दी
ये
जवानी
जानेमन
हो
गई
दिलचस्प
अपनी
भी
कहानी
जानेमन
Tanoj Dadhich
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किसी
से
छोटी
सी
एक
उम्मीद
बाँध
लीजिए
मोहब्बतों
का
अगर
जनाज़ा
निकालना
है
Shakeel Jamali
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मुझ
को
बीमार
करेगी
तिरी
आदत
इक
दिन
और
फिर
तुझ
से
भी
अच्छा
नहीं
हो
पाऊँगा
Rahul Jha
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तू
किसी
और
ही
दुनिया
में
मिली
थी
मुझ
सेे
तू
किसी
और
ही
मौसम
की
महक
लाई
थी
डर
रहा
था
कि
कहीं
ज़ख़्म
न
भर
जाएँ
मेरे
और
तू
मुट्ठियाँ
भर-भर
के
नमक
लाई
थी
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Tehzeeb Hafi
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तकल्लुफ़
छोड़कर
आओ
उसे
फिर
से
जिया
जाए
हमारा
बचपना
जो
एल्बमों
में
क़ैद
रहता
है
Shiva awasthi
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'फ़ैज़'
थी
राह
सर-ब-सर
मंज़िल
हम
जहाँ
पहुँचे
कामयाब
आए
Faiz Ahmad Faiz
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फिर
से
तड़पा
है
मन
आ
मुझे
प्यार
कर
कह
रहा
ये
गगन
आ
मुझे
प्यार
कर
तुमने
देखा
कटीले
नयन
से
तो
फिर
झूम
उठा
ये
बदन
आ
मुझे
प्यार
कर
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Murari Mandal
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इक
परी
के
साथ
में
हूँ
इक
परी
को
छोड़
कर
शा'इरी
को
जी
रहा
हूँ
ज़िंदगी
को
छोड़
कर
ये
मेरा
दावा
है
उसको
आज़मा
के
देखिए
आप
कुछ
भी
कर
सकेंगे
आशिक़ी
को
छोड़
कर
इस
बग़ीचे
में
हज़ारों
फूल
हैं
श्रीमान
जी
आप
के
ही
हैं
ये
सब
बस
उस
कली
को
छोड़
कर
पूछते
हैं
लोग
मुझ
सेे
काम
क्या
कर
लेते
हो
काम
कुछ
भी
है
नहीं
जी
शा'इरी
को
छोड़
कर
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Murari Mandal
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ग़मों
को
बस
ज़रा
सा
देखते
हैं
हुआ
है
जो
खु़लासा
देखते
हैं
कोई
है
जो
मुझे
मरहम
लगाए
मेरे
अपने
तमाशा
देखते
हैं
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Murari Mandal
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अगर
यूँँ
झूठ
पर
रिश्ता
बनेगा
तो
कोई
ख़ाक
फिर
अपना
बनेगा
Murari Mandal
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कोई
इक
शे'र
सुनके
रो
पड़ा
है
किसी
को
फ़र्क
नइ
पड़ता
ग़ज़ल
से
Murari Mandal
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