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Ankur Mishra
miTTi the miTTi ho ga.e
miTTi the miTTi ho ga.e | मिट्टी थे मिट्टी हो गए
- Ankur Mishra
मिट्टी
थे
मिट्टी
हो
गए
जाने
कहाँ
हम
खो
गए
इक
रात
ऐसी
आई
फिर
उन
तारों
के
हम
हो
गए
था
देखना
उस
चाँद
को
पर
जाने
कब
हम
सो
गए
सोचा
बचा
लूँ
ख़ुद
को
पर
फिर
उस
गली
में
खो
गए
जाना
था
ख़ुद
से
दूर
पर
हम
फिर
उसी
के
हो
गए
- Ankur Mishra
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फेंक
कर
रात
को
दीवार
पे
मारे
होते
मेरे
हाथों
में
अगर
चाँद
सितारे
होते
Unknown
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चाँद
तारे
इक
दिया
और
रात
का
कोमल
बदन
सुब्ह-दम
बिखरे
पड़े
थे
चार
सू
मेरी
तरह
Aziz Nabeel
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यार
सब
जम्अ'
हुए
रात
की
ख़ामोशी
में
कोई
रो
कर
तो
कोई
बाल
बना
कर
आया
Ahmad Mushtaq
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ख़्वाब
पलकों
की
हथेली
पे
चुने
रहते
हैं
कौन
जाने
वो
कभी
नींद
चुराने
आए
मुझ
पे
उतरे
मेरे
अल्हाम
की
बारिश
बन
कर
मुझ
को
इक
बूॅंद
समुंदर
में
छुपाने
आए
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Khalil Ur Rehman Qamar
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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हिज्र
में
अब
वो
रात
हुई
है
जिस
में
मुझको
ख़्वाबों
में
रेल
की
पटरी,
चाकू,
रस्सी,
बहती
नदियाँ
दिखती
हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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कहाँ
है
तू
कि
तिरे
इंतिज़ार
में
ऐ
दोस्त
तमाम
रात
सुलगते
हैं
दिल
के
वीराने
Nasir Kazmi
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वो
मुझको
जिस
तरह
से
दुआएँ
था
दे
रहा
मैं
तो
समझ
गया
ये
क़यामत
की
रात
हैं
AMAN RAJ SINHA
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जैसे
देखा
हो
आख़िरी
सपना
रात
इतनी
उदास
थीं
आँखें
Siraj Faisal Khan
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दफ़्तर
में
तय
किया
था
कि
तारे
गिनेंगे
आज
लेकिन
हमें
पहुंचते
ही
घर
नींद
आ
गई
Balmohan Pandey
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मुख़्तसर
दुनिया
जहाँ
में
हम
न
थे
उम्र-ए-रवाँ
में
बाद
उसके
मुद्दतों
के
चाॅंद
देखा
आसमाँ
में
है
सितम
ये
भी
सनम
अब
गुल
खिले
हैं
कहकशाँ
में
जानता
हूँ
है
नशा
इक
हम-नशीं
उस
हम-नवाँ
में
ख़ुश्क
आँखों
ने
कई
सच
भर
दिए
सहरा
भी
हाँ
में
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Ankur Mishra
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दिल
ही
तो
टूटा
है
हम
मरे
तो
नहीं
रास्ते
ख़त्म
सारे
हुए
तो
नहीं
ढूँढ़
लूँगा
मैं
फिर
ख़ुद
को
तुम
देखना
आइना
आइने
से
परे
तो
नहीं
मुद्दतों
से
हैं
हम
दूर
घर
से
मगर
पास
ख़ुद
के
भी
लेकिन
गए
तो
नहीं
उम्र
गुज़री
है
इक
ख़ुद
से
लड़ते
मगर
मात
खा
कर
भी
हम
पर
मरे
तो
नहीं
रात
भर
जागता
हूँ
ये
माना
मैं
पर
मर्ज़
ये
उसके
ही
वास्ते
तो
नहीं
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Ankur Mishra
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उन
दिनों
की
कहानी
है
ये
याद
कोई
पुरानी
है
ये
ज़ख़्म
कहना
कभी
मत
इसे
यार
उसकी
निशानी
है
ये
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Ankur Mishra
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बर्फ़
पलकों
पे
जो
ये
जमी
रह
गई
देर
तक
कोई
खिड़की
खुली
रह
गई
भूल
जाता
हूँ
हर
शाम
मैं
ख़ुद
को
ही
दूर
मुझ
सेे
कहीं
रौशनी
रह
गई
हार
कर
लौट
आया
हूँ
अपना
मैं
सब
मुठ्ठी
में
बस
ये
इक
ज़िंदगी
रह
गई
ज़ख़्म
खाकर
भी
इतने
ख़ुदा
जाने
क्यूँ
होंठों
पे
मेरे
कैसे
हँसी
रह
गई
अब
सुनाऊँ
किसे
क़िस्सा
बर्बादी
का
वो
नज़र
जो
झुकी
थी
झुकी
रह
गई
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Ankur Mishra
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ख़त्म
ये
फ़ासले
कर
दो
अब
होंठों
पर
होंठ
ये
धर
दो
अब
जाने
कब
मिलना
हो
क्या
पता
शा
में
यादों
से
ये
भर
दो
अब
मुद्दतों
बाद
तो
आए
हो
नाम
रातें
मेरे
कर
दो
अब
कब
से
बैठा
हूँ
राहों
में
मैं
सपनों
का
ही
कोई
घर
दो
अब
यादें
ये
जो
सताती
हैं
अब
यादों
से
इन
रिहा
कर
दो
अब
चाहे
ले
लो
ये
तुम
जान
भी
पहले
ख़ुद
से
जुदा
कर
दो
अब
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Ankur Mishra
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