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Ankur Mishra
haath ko ham chalo patwaar banaa lete hain
haath ko ham chalo patwaar banaa lete hain | हाथ को हम चलो पतवार बना लेते हैं
- Ankur Mishra
हाथ
को
हम
चलो
पतवार
बना
लेते
हैं
ख़ामुशी
को
चलो
हथियार
बना
लेते
हैं
ऐसे
कब
तक
हवा
के
साथ
बहेंगे
हम
भी
ख़ुद
को
अब
आओ
ख़रीदार
बना
लेते
हैं
जाने
कब
लौट
के
आएगा
वो
वापस
रहबर
आओ
इन
अश्कों
को
तलवार
बना
लेते
हैं
फिर
नहीं
आनी
जवानी
ये
दोबारा
'अंकुर'
दिल
को
अपना
चलो
सरदार
बना
लेते
हैं
- Ankur Mishra
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देखने
के
लिए
सारा
आलम
भी
कम
चाहने
के
लिए
एक
चेहरा
बहुत
Asad Badayuni
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इस
आ
समाँ
को
मुझ
सेे
है
क्या
दुश्मनी
"अली"?
भेजूं
अगर
दु'आ
भी
तो
सर
पर
लगे
मुझे
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Ali Rumi
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रहनुमाओं
की
अदाओं
पे
फ़िदा
है
दुनिया
इस
बहकती
हुई
दुनिया
को
सँभालो
यारो
Dushyant Kumar
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दो
झुके
नयनों
ने
जो
दिनभर
किया
संवाद
लेकर
मैं
अयोध्या
लौट
आया
लखनऊ
से
याद
लेकर
तीन
झुमका
चार
बोसा
पाँच
झप्पी
आठ
कंगन
रख
दिया
है
पर्स
में
पूरा
अमीनाबाद
लेकर
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Jatin shukla
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मैं
उस
को
देख
के
चुप
था
उसी
की
शादी
में
मज़ा
तो
सारा
इसी
रस्म
के
निबाह
में
था
Muneer Niyazi
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प्यार
दो
बार
थोड़ी
होता
है
हो
तो
फिर
प्यार
थोड़ी
होता
है
यही
बेहतर
है
तुम
उसे
रोको
मुझ
सेे
इनकार
थोड़ी
होता
है
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Zubair Ali Tabish
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तुम
पूछो
और
मैं
न
बताऊँ
ऐसे
तो
हालात
नहीं
एक
ज़रा
सा
दिल
टूटा
है
और
तो
कोई
बात
नहीं
Qateel Shifai
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झुके
तो
जन्नत
उठे
तो
ख़ंजर
करेंगी
हम
को
तबाह
आँखें
Parul Singh "Noor"
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सुख़न
का
जोश
कम
होता
नहीं
है
वगरना
क्या
सितम
होता
नहीं
है
भले
तुम
काट
दो
बाज़ू
हमारे
क़लम
का
सर
क़लम
होता
नहीं
है
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Baghi Vikas
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इश्क़
पहले
बना
था
जाने
जाँ
नींद
की
गोलियाँ
बनीं
थीं
फिर
Ashutosh Kumar "Baagi"
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दे
रहा
था
सभी
को
दिलासा
सर
उठाए
मैं
अपना
जनाज़ा
किस
तरह
आज़माऊँ
उसे
फिर
ख़्वाब
है
जो
मिरी
ख़्वाहिशों
का
बे-सबब
बे-वजह
पूछते
हो
आइने
से
पता
आदमी
का
रात
भर
तिश्नगी
में
किसी
की
यार
जलता
रहा
जुगनुओं
सा
एक
मुद्दत
हुई
जागते
अब
चाँद
तारों
की
सफ़
ज़िंदगी
आ
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Ankur Mishra
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ख़ुद
से
जो
हम
बेख़बर
रहने
लगे
थे
अश्क
इन
आँखों
से
फिर
बहने
लगे
थे
करते
क्या
शिकवा
किसी
से
हम
यहाँ
अब
तंज़
सारे
हम
ही
जब
सहने
लगे
थे
बाद
बरसों
के
तो
आया
था
ये
लम्हा
बाद
बरसों
के
वो
कुछ
कहने
लगे
थे
ख़्वाह
मख़ाह
ही
छोड़
आया
शहर
वो
मैं
यार
अब
तो
दिल
में
वो
रहने
लगे
थे
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Ankur Mishra
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इक
मुसलसल
काम
तू
कर
हम
को
ही
बदनाम
तू
कर
भर
चुके
हैं
ज़ख़्म
सारे
अब
नया
अज़्लाम
तू
कर
लौट
आऊँ
फिर
मैं
शायद
ख़ुद
को
मेरे
नाम
तू
कर
होश
में
आने
से
पहले
ख़ाली
चल
ये
जाम
तू
कर
कबसे
तन्हा
हूँ
मैं
'अंकुर'
बाहों
को
इन
बाम
तू
कर
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Ankur Mishra
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फिर
वही
देखो
मंज़र
नज़र
आया
है
प्यासा
कितना
समुंदर
नज़र
आया
है
हम
लगाए
थे
उम्मीद
जिस
सेे
यहाँ
पास
उसके
ही
खंज़र
नज़र
आया
है
छोड़
आया
था
वो
रस्ता
कब
का
मैं
तो
फिर
वो
क्यूँ
मेरे
अंदर
नज़र
आया
है
बरसों
भटका
हूँ
मैं
ख़ुद
के
अंदर
बशर
फिर
कहीं
वो
क़लंदर
नज़र
आया
है
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Ankur Mishra
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मिलती
जुलती
वो
सूरत
नज़र
आती
है
हर
किसी
की
ज़रूरत
नज़र
आती
है
रुक
सी
जाती
हैं
नज़रें
उसी
पे
ही
बस
सादगी
की
वो
मूरत
नज़र
आती
है
कैसे
रोकूॅं
मैं
ख़ुद
को
फ़ना
होने
से
ये
मोहब्बत
कुदूरत
नज़र
आती
है
पास
मेरे
नहीं
कुछ
सिवा
मेरे
अब
उसकी
अब
फिर
ज़रूरत
नज़र
आती
है
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Ankur Mishra
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