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Ankur Mishra
ik musalsal kaam tu kar
ik musalsal kaam tu kar | इक मुसलसल काम तू कर
- Ankur Mishra
इक
मुसलसल
काम
तू
कर
हम
को
ही
बदनाम
तू
कर
भर
चुके
हैं
ज़ख़्म
सारे
अब
नया
अज़्लाम
तू
कर
लौट
आऊँ
फिर
मैं
शायद
ख़ुद
को
मेरे
नाम
तू
कर
होश
में
आने
से
पहले
ख़ाली
चल
ये
जाम
तू
कर
कबसे
तन्हा
हूँ
मैं
'अंकुर'
बाहों
को
इन
बाम
तू
कर
- Ankur Mishra
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सोज़-ए-निहाँ
की
आग
से
डरते
हैं
इस
खट-राग
से
मुश्किल
था
बचना
मेरा
पर
ज़िंदा
हूँ
इस
बैराग
से
कैसे
करूँँ
ख़ुद
पे
यक़ीं
वाक़िफ़
हूँ
इस
बे-लाग
से
उतरा
नहीं
वो
रंग
फिर
जो
लग
गया
उस
आग
से
बरसों
रहा
प्यासा
मैं
पर
दिल
भर
गया
वैताग
से
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ज़ख़्म
जितने
थे
आख़िर
में
भर
ही
गए
दिन
वो
भी
मुफ़्लिसी
के
गुज़र
ही
गए
याद
आता
है
वो
घर
वो
चौखट
मगर
पार
दहलीज़
फिर
भी
वो
कर
ही
गए
ठीक
है
हम
नहीं
दरिया
लेकिन
उसे
आँखों
से
रूह
तक
यार
भर
ही
गए
चोट
गहरी
थी
जो
दे
गया
वो
हमें
यादों
से
फिर
भी
उसकी
उभर
ही
गए
बनते
बनते
तमाशा
मोहब्बत
में
हम
एक
दिन
बाहों
में
उसकी
मर
ही
गए
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ज़ुल्फ़ों
में
अपनी
सजा
कर
ले
गया
मुझको
चुरा
कर
देखता
हूँ
रास्ता
मैं
सामने
उसको
बिठा
कर
काट
ली
अपनी
कलाई
नाम
फिर
उसका
मिटा
कर
सोचता
हूँ
कैसे
होगा
मसअला
हल
ज़हर
खा
कर
लौट
आ
ऐ
ज़िंदगी
अब
हाथ
'अंकुर'
से
छुड़ा
कर
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इसलिए
भी
वो
अमाइल
है
क़ातिलों
में
मेरे
शामिल
है
हर
नज़र
है
उस
नज़र
पर
जो
मेरी
ख़्वाहिश
मेरी
मंज़िल
है
जा
रहा
हूँ
शहरस
उसके
क्यूँ
निकलना
दिल
से
मुश्किल
है
सो
रहा
है
चैन
से
कितने
मेरे
सपनों
का
जो
क़ातिल
है
बिखरा
है
जो
टूट
कर
'अंकुर'
क़दमों
में
तेरे
मिरा
दिल
है
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उस
मुस्तक़िल
किरदार
से
हैं
तंग
इस
दस्तार
से
जीते
नहीं
माना
मगर
हारे
नहीं
पर
हार
से
मुश्किल
में
हैं
वो
कारवाँ
हैं
सर-ब-सर
बेज़ार
से
चाहा
बहुत
पाना
मगर
थे
दूर
उस
दीवार
से
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