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Ankur Mishra
us mustaqil kirdaar se
us mustaqil kirdaar se | उस मुस्तक़िल किरदार से
- Ankur Mishra
उस
मुस्तक़िल
किरदार
से
हैं
तंग
इस
दस्तार
से
जीते
नहीं
माना
मगर
हारे
नहीं
पर
हार
से
मुश्किल
में
हैं
वो
कारवाँ
हैं
सर-ब-सर
बेज़ार
से
चाहा
बहुत
पाना
मगर
थे
दूर
उस
दीवार
से
- Ankur Mishra
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रखते
क्यूँ
राब्ता
बाग़बाँ
से
लोग
वाक़िफ़
थे
फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ
से
सूख
जाते
हैं
शाख़ों
पे
पत्ते
टूट
जाते
हैं
कार-ए-जहाँ
से
इसलिए
जान
देनी
पड़ी
फिर
जान
जाए
न
अस्र-ए-रवाँ
से
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ऐसा
कुछ
यार
कर
जाते
हम
एक
पल
में
बिखर
जाते
हम
जिस
तरह
छोड़ा
उसने
हमें
लाज़िमी
था
के
मर
जाते
हम
खो
गई
साँसें
जिन
गलियों
में
छोड़
वो
दर
किधर
जाते
हम
इक
वो
ही
तो
था
अपना
बशर
लौट
के
कैसे
घर
जाते
हम
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घूम
कर
आना
था
सो
हम
आ
गए
उस
गली
की
ख़ाक
को
हम
भा
गए
सोच
रक्खा
था
रखेंगे
फ़ासला
पर
नज़र
में
ज़ख़्म
जो
थे
आ
गए
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Ankur Mishra
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दरमियाँ
एक
दीवार
रखना
ख़ुद
को
ख़ुद
से
ख़बरदार
रखना
रात
भर
आएगी
याद
उसकी
मय-कदों
को
खुला
यार
रखना
सीख
लूँगा
हुनर
बंदगी
का
अश्क
आँखों
में
सरकार
रखना
दे
रही
हैं
सदाएँ
हवाएँ
दूर
कश्ती
से
पतवार
रखना
फिर
दुबारा
न
जाऊँ
बिखर
मैं
बाँधकर
ज़ुल्फ़ें
इस
बार
रखना
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होंठों
पे
आज
भी
वो
निशाँ
है
हर्फ़
दर
हर्फ़
उल्फ़त
जवाँ
है
मिट
गए
फ़ासले
फ़ासलों
से
इन
लकीरों
में
दोनों
जहाँ
है
बाद
उसके
भी
रहना
है
ज़िंदा
इश्क़
मुश्किल
बड़ा
इम्तिहाँ
है
डर
है
खो
दूँ
न
ख़ुद
को
कहीं
मैं
ख़ामुशी
इतनी
साहिब
यहाँ
है
नींद
आए
भी
तो
कैसे
अंकुर
सर
पे
मेरे
खुला
आसमाँ
है
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