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Ankur Mishra
milti julti vo soorat nazar aati hai
milti julti vo soorat nazar aati hai | मिलती जुलती वो सूरत नज़र आती है
- Ankur Mishra
मिलती
जुलती
वो
सूरत
नज़र
आती
है
हर
किसी
की
ज़रूरत
नज़र
आती
है
रुक
सी
जाती
हैं
नज़रें
उसी
पे
ही
बस
सादगी
की
वो
मूरत
नज़र
आती
है
कैसे
रोकूॅं
मैं
ख़ुद
को
फ़ना
होने
से
ये
मोहब्बत
कुदूरत
नज़र
आती
है
पास
मेरे
नहीं
कुछ
सिवा
मेरे
अब
उसकी
अब
फिर
ज़रूरत
नज़र
आती
है
- Ankur Mishra
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हम-नशीं
उस
हम-नवा
से
बे-ख़बर
थे
हम
वफ़ा
से
सम्त
उसकी
थे
मगर
सब
दूर
थे
दस्त-ए-शिफ़ा
से
रात
भर
जलते
रहे
हम
क्यूँ
वफ़ा
कर
के
हवा
से
आसमाँ
है
ख़्वाहिशों
का
इस
ज़मीं
पे
उस
सदास
हर
दफ़ा
ज़ख़्मी
हुए
हैं
ख़्वाब
मेरे
बा-हया
से
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फिर
गले
ख़ुद
को
लगा
कर
कर
दिया
रुख़्सत
रुला
कर
देखते
कैसे
कोई
हम
ख़्वाब
यूँॅं
पर्दा
गिरा
कर
भर
गए
थे
रूह
तक
हम
जिस्म
की
सूरत
में
आ
कर
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रात
कट
जाएगी
दिन
गुज़र
जाएगा
चोट
कैसी
भी
हो
ज़ख़्म
भर
जाएगा
उड़
गया
तोड़
कर
डोर
जो
साँसों
की
एक
दिन
वो
परिंदा
भी
मर
जाएगा
मान
लेता
हूँ
मेरा
नहीं
वो
मगर
दाग़
दामन
पे
लेकर
किधर
जाएगा
ख़ामख़ाँ
कर
दिया
मैंने
ख़ुद
को
फ़ना
वो
किनारे
से
पहले
उतर
जाएगा
ज़िंदगी
ले
रही
है
अभी
इम्तिहाँ
आँख
से
डर
है
काजल
बिखर
जाएगा
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बे-ख़बर
मेरी
तरब
से
है
आँख
नम
जाने
ये
कब
से
है
छोड़
देते
मय-कशी
लेकिन
प्यास
ज़िंदा
ही
तलब
से
है
इन
अँधेरों
से
है
रौशन
जो
रात
वो
यादों
की
शब
से
है
ये
मोहब्बत
वो
मोहब्बत
थी
बे-अदब
भी
जो
अदब
से
है
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हम
भी
पढ़ते
पर
मोहब्बत
में
हर्फ़
दिखते
हैं
कहाँ
ख़त
में
आइने
की
सम्त
बैठा
है
आइना
इक
तेरी
सूरत
में
बा-वफ़ा
होकर
भी
अंकुर
ने
है
गुज़ारी
बस
जहालत
में
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Ankur Mishra
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