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Ankur Mishra
phir gale KHud ko laga kar
phir gale KHud ko laga kar | फिर गले ख़ुद को लगा कर
- Ankur Mishra
फिर
गले
ख़ुद
को
लगा
कर
कर
दिया
रुख़्सत
रुला
कर
देखते
कैसे
कोई
हम
ख़्वाब
यूँॅं
पर्दा
गिरा
कर
भर
गए
थे
रूह
तक
हम
जिस्म
की
सूरत
में
आ
कर
- Ankur Mishra
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अब
वो
भी
आज़माने
लगा
है
नाम
ले
कर
बुलाने
लगा
है
उम्र
भर
साथ
चलना
कहा
था
वो
तो
नज़दीक
आने
लगा
है
रोज़
खाता
था
क़स
में
वफ़ा
की
आज
करवट
बदलने
लगा
है
पार
कैसे
हो
दरिया
ये
जानाँ
अक्स
उसका
उभरने
लगा
है
फ़ासले
बे-सबब
ही
नहीं
ये
फ़ासला
वो
बनाने
लगा
है
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न
आँखों
से
यूँँ
अब
इशारा
करो
कभी
नाम
ले
कर
पुकारा
करो
मैं
कब
कहता
हूँ
साथ
रहने
को
पर
यूँँ
भी
तो
न
मुझ
सेे
किनारा
करो
है
बाक़ी
अभी
जान
इस
जिस्म
में
यूँँ
ही
तीर
नज़रों
के
मारा
करो
गवारा
है
मुझको
ये
अब
मर्ज़
भी
चलो
इश्क़
आओ
दुबारा
करो
मैं
तैयार
हूँ
जान
देने
को
पर
गिला
कोई
मुझ
सेे
न
यारा
करो
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रात
कट
जाएगी
दिन
गुज़र
जाएगा
चोट
कैसी
भी
हो
ज़ख़्म
भर
जाएगा
उड़
गया
तोड़
कर
डोर
जो
साँसों
की
एक
दिन
वो
परिंदा
भी
मर
जाएगा
मान
लेता
हूँ
मेरा
नहीं
वो
मगर
दाग़
दामन
पे
लेकर
किधर
जाएगा
ख़ामख़ाँ
कर
दिया
मैंने
ख़ुद
को
फ़ना
वो
किनारे
से
पहले
उतर
जाएगा
ज़िंदगी
ले
रही
है
अभी
इम्तिहाँ
आँख
से
डर
है
काजल
बिखर
जाएगा
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तिश्नगी
में
तिरी
दर-ब-दर
सा
हो
गया
हूँ
चराग़-ए-सहर
सा
क्या
ख़बर
डूब
जाऊँ
कहाँ
मैं
जल
रहा
हूँ
सनम
दोपहर
सा
सम्त
जाते
हुए
उन
लबों
के
मैं
भी
बिखरा
था
मौज़-ए-गुहर
सा
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सम्त
उसकी
हर
नज़र
है
क्या
यही
हुस्न-ए-असर
है
जानता
हूँ
जानता
है
अब
तलक
वो
बे-ख़बर
है
सामने
है
आइना
या
आइने
में
वो
नज़र
है
इन
लबों
पे
उन
लबों
का
अब
कहाँ
वैसा
असर
है
ढूँढता
है
हम-सफ़र
वो
ख़ुद
जो
अंकुर
दर-ब-दर
है
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