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Ankur Mishra
Tishnagi men teri dar-ba-dar sa
तिश्नगी में तिरी दर-ब-दर सा
- Ankur Mishra
तिश्नगी
में
तिरी
दर-ब-दर
सा
हो
गया
हूँ
चराग़-ए-सहर
सा
क्या
ख़बर
डूब
जाऊँ
कहाँ
मैं
जल
रहा
हूँ
सनम
दोपहर
सा
सम्त
जाते
हुए
उन
लबों
के
मैं
भी
बिखरा
था
मौज़-ए-गुहर
सा
- Ankur Mishra
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भर
न
जाए
कहीं
ज़ख़्म
डरता
हूँ
मैं
ज़र्रा
ज़र्रा
जमा
ख़ुद
को
करता
हूँ
मैं
झाँकते
हैं
दरीचे
दरीचों
से
अब
खिड़कियों
से
सनम
पर्दा
करता
हूँ
मैं
की
मोहब्बत
मगर
आज़माई
नहीं
इसलिए
प्यास
से
प्यास
भरता
हूँ
मैं
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इसलिए
भी
वो
अमाइल
है
क़ातिलों
में
मेरे
शामिल
है
हर
नज़र
है
उस
नज़र
पर
जो
मेरी
ख़्वाहिश
मेरी
मंज़िल
है
जा
रहा
हूँ
शहरस
उसके
क्यूँ
निकलना
दिल
से
मुश्किल
है
सो
रहा
है
चैन
से
कितने
मेरे
सपनों
का
जो
क़ातिल
है
बिखरा
है
जो
टूट
कर
'अंकुर'
क़दमों
में
तेरे
मिरा
दिल
है
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घूम
कर
आना
था
सो
हम
आ
गए
उस
गली
की
ख़ाक
को
हम
भा
गए
सोच
रक्खा
था
रखेंगे
फ़ासला
पर
नज़र
में
ज़ख़्म
जो
थे
आ
गए
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Ankur Mishra
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लौट
जाऍंगे
परिंदे
सब
ठिकाने
पे
आ
गई
है
फिर
मोहब्बत
आज़माने
पे
एक
सी
तासीर
है
दोनों
की
लेकिन
क्यूँ
कुम्हला
जाते
हैं
गुल
दिल
से
लगाने
पे
बह
रहे
हैं
अश्क
आँखों
से
मगर
फिर
भी
है
तुला
अंकुर
मुझे
जबरन
पिलाने
पे
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इश्क़
में
अब
ख़सारे
बहुत
हैं
इस
नदी
के
किनारे
बहुत
हैं
छोड़
के
जाएँ
कैसे
उसे
हम
पन्ने
उल्फ़त
के
खारे
बहुत
हैं
ले
न
जाए
चुरा
उसको
कोई
आसमाँ
में
सितारे
बहुत
हैं
कैसे
देखूँ
मैं
अब
आइना
ये
ज़ख़्म
इस
में
हमारे
बहुत
हैं
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