milti hai khoo-e-yaar se naar iltihaab men | मिलती है ख़ू-ए-यार से नार इल्तिहाब में

  - Mirza Ghalib
मिलतीहैख़ू-ए-यारसेनारइल्तिहाबमें
काफ़िरहूँगरमिलतीहोराहतअज़ाबमें
कबसेहूँक्याबताऊँजहान-ए-ख़राबमें
शब-हा-ए-हिज्रकोभीरखूँगरहिसाबमें
ताफिरइंतिज़ारमेंनींदआएउम्रभर
आनेकाअहदकरगएआएजोख़्वाबमें
क़ासिदकेआतेआतेख़तइकऔरलिखरखूँ
मैंजानताहूँजोवोलिखेंगेजवाबमें
मुझतककबउनकीबज़्ममेंआताथादौर-ए-जाम
साक़ीनेकुछमिलादियाहोशराबमें
जोमुनकिर-ए-वफ़ाहोफ़रेबउसपेक्याचले
क्यूँँबद-गुमाँहूँदोस्तसेदुश्मनकेबाबमें
मैंमुज़्तरिबहूँवस्लमेंख़ौफ़-ए-रक़ीबसे
डालाहैतुमकोवहमनेकिसपेच-ओ-ताबमें
मैंऔरहज़्ज़-ए-वस्लख़ुदा-साज़बातहै
जाँनज़्रदेनीभूलगयाइज़्तिराबमें
हैतेवरीचढ़ीहुईअंदरनक़ाबके
हैइकशिकनपड़ीहुईतरफ़-ए-नक़ाबमें
लाखोंलगाओएकचुरानानिगाहका
लाखोंबनावएकबिगड़नाइ'ताबमें
वोनालादिलमेंख़सकेबराबरजगहपाए
जिसनालासेशिगाफ़पड़ेआफ़्ताबमें
वोसेहरमुद्दआ-तलबीमेंकामआए
जिससेहरससफ़ीनारवाँहोसराबमें
'ग़ालिब'छुटीशराबपरअबभीकभीकभी
पीताहूँरोज़-ए-अब्रशब-ए-माहताबमें
  - Mirza Ghalib
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