gar tujh ko hai yaqeen-e-ijaabat dua na maang | गर तुझ को है यक़ीन-ए-इजाबत दु'आ न माँग

  - Mirza Ghalib
गरतुझकोहैयक़ीन-ए-इजाबतदु'आमाँग
या'नीबग़ैर-ए-यक-दिल-ए-बे-मुद्दआमाँग
आताहैदाग़-ए-हसरत-ए-दिलकाशुमारयाद
मुझसेमिरेगुनहकाहिसाबख़ुदामाँग
आरज़ूशहीद-ए-वफ़ाख़ूँ-बहामाँग
जुज़बहर-ए-दस्त-ओ-बाज़ू-ए-क़ातिलदु'आमाँग
बरहमहैबज़्म-ए-ग़ुंचाब-यक-जुंबिश-ए-नशात
काशानाबस-कितंगहैग़ाफ़िलहवामाँग
मैंदूरगर्द-ए-अर्ज़-ए-रुसूम-ए-नियाज़हूँ
दुश्मनसमझवलेनिगह-ए-आशनामाँग
यक-बख़्तऔजनज़्र-ए-सुबुक-बारी-ए-'असद'
सरपरवबाल-ए-साया-ए-बाल-ए-हुमामाँग
गुस्ताख़ी-ए-विसालहैमश्शाता-ए-नियाज़
या'नीदु'आब-जुज़ख़म-ए-ज़ुल्फ़-ए-दुतामाँग
ईसातिलिस्महुस्नतग़ाफ़ुलहैज़ीनहार
जुज़पुश्तचश्मनुस्ख़ाअर्ज़दवामाँग
दीगरदिलख़ूनींनफ़स
  - Mirza Ghalib
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