tum jaano tum ko gair se jo rasm-o-raah ho | तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो

  - Mirza Ghalib
तुमजानोतुमकोग़ैरसेजोरस्म-ओ-राहहो
मुझकोभीपूछतेरहोतोक्यागुनाहहो
बचतेनहींमुवाख़ज़ा-ए-रोज़-ए-हश्रसे
क़ातिलअगररक़ीबहैतोतुमगवाहहो
क्यावोभीबे-गुनह-कुशहक़-ना-शनासहैं
मानाकितुमबशरनहींख़ुर्शीदमाहहो
उभराहुआनक़ाबमेंहैउनकेएकतार
मरताहूँमैंकियेकिसीकीनिगाहहो
जबमय-कदाछुटातोफिरअबक्याजगहकीक़ैद
मस्जिदहोमदरसाहोकोईख़ानक़ाहहो
सुनतेहैंजोबहिश्तकीता'रीफ़सबदुरुस्त
लेकिनख़ुदाकरेवोतिराजल्वा-गाहहो
'ग़ालिब'भीगरहोतोकुछऐसाज़ररनहीं
दुनियाहोयारबऔरमिराबादशाहहो
  - Mirza Ghalib
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