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Afzal Ali Afzal
in dinon dost mere saare hi roothe hue hain
in dinon dost mere saare hi roothe hue hain | इन दिनों दोस्त मेरे सारे ही रूठे हुए हैं
- Afzal Ali Afzal
इन
दिनों
दोस्त
मेरे
सारे
ही
रूठे
हुए
हैं
मेरे
दुश्मन
यही
मौक़ा
है
हरा
दे
मुझ
को
- Afzal Ali Afzal
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दुश्मनी
का
सफ़र
इक
क़दम
दो
क़दम
तुम
भी
थक
जाओगे
हम
भी
थक
जाएँगे
Bashir Badr
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दुश्मनी
जम
कर
करो
लेकिन
ये
गुंजाइश
रहे
जब
कभी
हम
दोस्त
हो
जाएँ
तो
शर्मिंदा
न
हों
Bashir Badr
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इस
आ
समाँ
को
मुझ
सेे
है
क्या
दुश्मनी
"अली"?
भेजूं
अगर
दु'आ
भी
तो
सर
पर
लगे
मुझे
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Ali Rumi
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अगर
रक़ीब
न
होते
तो
दोस्त
होते
आप
हमारे
शौक़,
ख़यालात
एक
जैसे
हैं
Amulya Mishra
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जंग
अपनों
के
बीच
जारी
है
सबके
हाथों
में
इक
कटारी
है
छत
हो
दीवार
हो
कि
दरवाज़ा
सबकी
अपनी
ही
ज़िम्मेदारी
है
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Santosh S Singh
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शराफ़त
ने
मुझको
कहीं
का
न
छोड़ा
रक़ीब
अपने
ख़त
मुझ
सेे
लिखवा
रहे
हैं
Rajesh Reddy
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ख़ास
तो
कुछ
भी
नहीं
बदला
तुम्हारे
बाद
में
पहले
गुम
रहता
था
तुम
में,
अब
तुम्हारी
याद
में
मोल
हासिल
हो
गया
है
मुझको
इक-इक
शे'र
का
सब
दिलासे
दे
रहे
हैं
मुझको
"जस्सर"
दाद
में
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Avtar Singh Jasser
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इश्क़
तू
ने
बड़ा
नुक़सान
किया
है
मेरा
मैं
तो
उस
शख़्स
से
नफ़रत
भी
नहीं
कर
सकता
Liaqat Jafri
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तू
मोहब्बत
से
कोई
चाल
तो
चल
हार
जाने
का
हौसला
है
मुझे
Ahmad Faraz
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मुझ
सेे
जो
मुस्कुरा
के
मिला
हो
गया
उदास
ताज़ा
हवा
की
खिड़कियों
को
जंग
लग
गई
Siddharth Saaz
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कहाँ
कहाँ
पे
उसे
ढूंढते
हैं
हम
यारों
किसी
के
लम्स
से
होता
था
जो
सुकूँ
दिल
को
Afzal Ali Afzal
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सीने
में
मेरे
दिल
है,
पर
अब
उस
में
तू
नहीं
यानी
तिजोरी
तो
है
मगर
धन
नहीं
बचा
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Afzal Ali Afzal
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कल
रात
मैं
बहुत
ही
अलग
सा
लगा
मुझे
उसकी
नज़र
ने
यूँँ
मेरी
सूरत
खंगाली
दोस्त
Afzal Ali Afzal
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बादलों
में
से
छनता
हुआ
नूर
देख
ऐसी
रौशन
जबीं
है
मेरे
यार
की
Afzal Ali Afzal
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दिल
को
मेरे
बस
यही
मलाल
है
हिज्र
अपने
दरमियाँ
बहाल
है
दिल
ये
बूढ़ा
ग़म
से
क्यूँँ
निढाल
है
क्या
मोहब्बतों
का
ये
ज़वाल
है
पगड़ियों
से
हैं
बंधे
हुए
क़दम
और
पगड़ियों
का
ही
ख़याल
है
ऐसे
घाव
दे
दिए
हैं
इश्क़
ने
रूह
तक
भी
ख़ून-ए-दिल
से
लाल
है
ग़म
की
धुन
पे
रक़्स
करती
ज़िन्दगी
धड़कनों
का
शोर
देता
ताल
है
हाए
रुख़
पे
माहताब
सा
है
नूर
और
उस
पे
ज़ेर-ए-लब
जो
ख़ाल
है
पी
के
जाम
शेख़
जी
बता
रहे
क्या
है
शिर्क
और
क्या
हलाल
है
पहले
इश्क़
देता
है
सुकून
फिर
लाख
तोहमतों
का
एक
जाल
है
जान
देता
है
तो
दे
कोई
मगर
किस
को
यां
किसी
का
अब
ख़याल
है
ये
किधर
से
आ
रहा
है
माहताब
उस
का
घर
तो
जानिब-ए-शुमाल
है
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Afzal Ali Afzal
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