khat likh ke koi saada na us ko malool ho | ख़त लिख के कोई सादा न उस को मलूल हो

  - Meer Taqi Meer
ख़तलिखकेकोईसादाउसकोमलूलहो
हमतोहूँबद-गुमानजोक़ासिद-ए-रसूलहो
चाहूँतोभरकेकौलीउठालूँअभीतुम्हें
कैसेहीभारीहोमिरेआगेतोफूलहो
सुर्माजोनूरबख़्शेहैआँखोंकोख़ल्क़की
शायदकिराह-ए-यारकीहीख़ाकधूलहो
जावेंनिसारहोनेकोहमकिसबिसातपर
इकनीमजाँरखेंहैंसोवोजबक़ुबूलहो
हमइनदिनोंमेंलगनहींपड़तेहैंसुब्ह-ओ-शाम
वर्नादु'आकरेंतोजोचाहेंहुसूलहो
दिललेकेलौंडेदिल्लीकेकबकापचागए
अबउनसेखाईपीहुईशयकियावसूलहो
नाकामइसलिएहोकिचाहोहोसबकुछआज
तुमभीतो'मीर'साहिब-ओ-क़िबलाअजूलहो
  - Meer Taqi Meer
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