kab se nazar lagii thii darwaaza-e-haram se | कब से नज़र लगी थी दरवाज़ा-ए-हरम से

  - Meer Taqi Meer
कबसेनज़रलगीथीदरवाज़ा-ए-हरमसे
पर्दाउठातोलड़ियाँआँखेंहमारीहमसे
सूरत-गर-ए-अजलकाक्याहाथथाकहेतो
खींचीवोतेग़-ए-अबरूफ़ौलादकेक़लमसे
सोज़िशगईदिलकीरोनेसेरोज़-ओ-शबके
जलताहूँऔरदरियाबहतेहैंचश्म-ए-नमसे
ताअ'तकावक़्तगुज़रामस्तीमेंआबरज़की
अबचश्म-दाश्तउसकेयाँहैफ़क़तकरमसे
कुढि़एरोइएतोऔक़ातक्यूँँकेगुज़रे
रहताहैमश्ग़लासाबार-ए-ग़म-ओ-अलमसे
मशहूरहैसमाजतमेरीकितेग़बरसी
परमैंसरउठायाहरगिज़तिरेक़दमसे
बातएहतियातसेकरज़ाएअ'करनफ़सको
बालीदगी-ए-दिलहैमानिंद-ए-शीशादमसे
क्याक्यातअबउठाएक्याक्याअज़ाबदेखे
तबदिलहुआहैउतनाख़ूगरतिरेसितमसे
हस्तीमेंहमनेकरआसूदगीदेखी
खुलतींकाशआँखेंख़्वाबख़ुशअदमसे
पामालकरकेहमकोपछताओगेबहुततुम
कमयाबहैंजहाँमेंसरदेनेवालेहमसे
दिलदोहो'मीर'साहबउसबद-मआ'शकोतुम
ख़ातिरतोजम्अ''करलोटकक़ौलसेक़समसे
  - Meer Taqi Meer
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy