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Meem Maroof Ashraf
kuchh bhi hamaare saath men achha nahin hua
kuchh bhi hamaare saath men achha nahin hua | कुछ भी हमारे साथ में अच्छा नहीं हुआ
- Meem Maroof Ashraf
कुछ
भी
हमारे
साथ
में
अच्छा
नहीं
हुआ
यानी
बुरा
हुआ
है
ज़्यादा
नहीं
हुआ
- Meem Maroof Ashraf
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सगी
बहनों
का
जो
रिश्ता
रिश्ता
है
उर्दू
और
हिन्दी
में
कहीं
दुनिया
की
दो
ज़िंदा
ज़बानों
में
नहीं
मिलता
Munawwar Rana
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अब
मज़ीद
उस
सेे
ये
रिश्ता
नहीं
रक्खा
जाता
जिस
सेे
इक
शख़्स
का
पर्दा
नहीं
रक्खा
जाता
पढ़ने
जाता
हूँ
तो
तस्में
नहीं
बाँधे
जाते
घर
पलटता
हूँ
तो
बस्ता
नहीं
रक्खा
जाता
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Tehzeeb Hafi
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तेरे
साथ
भी
मुश्किल
पड़ता
था
तेरे
बिन
तो
गुजारा
क्या
होता
गर
तू
भी
नहीं
होता
तो
न
जाने
दोस्त
हमारा
क्या
होता
Siddharth Saaz
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मंज़र
बना
हुआ
हूँ
नज़ारे
के
साथ
मैं
कितनी
नज़र
मिलाऊँ
सितारे
के
साथ
मैं
दरिया
से
एक
घूँट
उठाने
के
वास्ते
भागा
हूँ
कितनी
दूर
किनारे
के
साथ
मैं
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Khalid Sajjad
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कितनी
मुश्किल
के
बाद
टूटा
है
एक
रिश्ता
कभी
जो
था
ही
नहीं
Shahbaz Rizvi
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फिरता
है
कैसे-कैसे
सवालों
के
साथ
वो
उस
आदमी
की
जामातलाशी
तो
लीजिए
Dushyant Kumar
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तुम
अगर
साथ
देने
का
वा'दा
करो
मैं
यूँँही
मस्त
नग़्में
लुटाता
रहूँ
तुम
मुझे
देख
कर
मुस्कुराती
रहो
मैं
तुम्हें
देख
कर
गीत
गाता
रहूँ
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Sahir Ludhianvi
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सात
टुकड़े
हुए
मेरे
दिल
के
एक
हफ़्ता
लगा
सँभलने
में
Tanoj Dadhich
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मौत
के
साथ
हुई
है
मिरी
शादी
सो
'ज़फ़र'
उम्र
के
आख़िरी
लम्हात
में
दूल्हा
हुआ
मैं
Zafar Iqbal
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ख़मोश
झील
के
पानी
में
वो
उदासी
थी
कि
दिल
भी
डूब
गया
रात
माहताब
के
साथ
Rehman Faris
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क्या
शिकस्तें
शुमार
करते
हो
तुम
फ़क़त
मेरा
हौसला
देखो
Meem Maroof Ashraf
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वो
अय्याम-ए-ग़म-ए-माज़ी
के
लम्हे
मिरे
आँसू
तिरा
आँचल
रहा
है
Meem Maroof Ashraf
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वास्ते
जिस
के
सब
गँवा
डाला
हम
को
उस
शख़्स
ने
भुला
डाला
अच्छे
ख़ासे
सुकूँ
से
बैठे
थे
फिर
किसी
याद
ने
रुला
डाला
मिस्ल-ए-का'बा
था
तुझ
को
क्या
मालूम
वो
मकाँ
तू
ने
जो
गिरा
डाला
बाज़ी-ए-'इश्क़
का
न
पूछो
तुम
जो
भी
कुछ
था
वो
सब
लगा
डाला
कल
तलक
तो
वो
था
लकीरों
में
और
फिर
दफ़'अतन
मिटा
डाला
प्यार
की
आख़िरी
निशानी
था
वो
तिरा
ख़त
भी
अब
जला
डाला
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Meem Maroof Ashraf
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थोड़ा
बहुत
तो
याद
रहेगा
ज़रूर
वो
थोड़ा
बहुत
तो
अब
भी
उसे
चाहते
हैं
हम
Meem Maroof Ashraf
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कितनी
मुश्किल
से
तुझ
को
पाया
था
कितनी
आसानी
से
गँवा
डाला
Meem Maroof Ashraf
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