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Meem Maroof Ashraf
ham ahl-e-dil mohabbat men nahin karte hain laffaazi
ham ahl-e-dil mohabbat men nahin karte hain laffaazi | हम अहल-ए-दिल मोहब्बत में नहीं करते हैं लफ़्फ़ाज़ी
- Meem Maroof Ashraf
हम
अहल-ए-दिल
मोहब्बत
में
नहीं
करते
हैं
लफ़्फ़ाज़ी
जो
हम
को
करना
होता
है
वो
आख़िर
कर
गुज़रते
हैं
- Meem Maroof Ashraf
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मुहब्बत
के
समुंदर
की
कलाकारी
ग़ज़ब
की
है
कि
सब
कुछ
डूब
जाता
है
मगर
तर
कुछ
नहीं
होता
Muntazir Firozabadi
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ये
मोहब्बत
भी
किन
दिनों
में
हुई
दिल
मिलाने
थे
हाथ
से
भी
गए
Kafeel Rana
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कभी
ये
भी
नहीं
पूछा
है
गर्दन
पे
निशाँ
कैसा
हमें
अंधी
मोहब्बत
थी
हमें
अंधा
भरोसा
था
Shayra kirti
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किया
बादलों
में
सफ़र
ज़िंदगी
भर
ज़मीं
पर
बनाया
न
घर
ज़िंदगी
भर
सभी
ज़िंदगी
के
मज़े
लूटते
हैं
न
आया
हमें
ये
हुनर
ज़िंदगी
भर
मोहब्बत
रही
चार
दिन
ज़िंदगी
में
रहा
चार
दिन
का
असर
ज़िंदगी
भर
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Anwar Shaoor
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भाई
बहनों
की
मोहब्बत
का
नशा
मत
पूछिए
बे-तकल्लुफ़
हो
गए
तो
गुदगुदी
तक
आ
गए
Iftikhar Falak Kazmi
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यार
तेरी
मुझे
ज़रूरत
है
इक
तू
ही
तो
मेरी
मुहब्बत
है
Arohi Tripathi
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मुहब्बत
रतजगे
आवारागर्दी
ज़रूरी
काम
सारे
हो
रहे
हैं
Madan Mohan Danish
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मुझ
ऐसा
शख़्स
अगर
क़हक़हों
से
भर
जाए
ये
साँस
लेती
उदासी
तो
घुट
के
मर
जाए
वो
मेरे
बाद
तरस
जाएगा
मोहब्बत
को
उसे
ये
कहना
अगर
हो
सके
तो
मर
जाए
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Rakib Mukhtar
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अब
मैं
क्या
अपनी
मोहब्बत
का
भरम
भी
न
रखूँ
मान
लेता
हूँ
कि
उस
शख़्स
में
था
कुछ
भी
नहीं
Jawwad Sheikh
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क़ब्रों
में
नहीं
हम
को
किताबों
में
उतारो
हम
लोग
मोहब्बत
की
कहानी
में
मरे
हैं
Ajaz tawakkal
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फ़क़त
इतना
बताना
चाहता
है
दिवाना
तुझ
को
कितना
चाहता
है
नहीं
ख़्वाहिश
इसे
दैर-ओ-हरम
की
तेरी
बाँहों
में
मरना
चाहता
है
ये
दिल
बर्बाद
होने
के
लिए
फिर
मोहब्बत
का
सहारा
चाहता
है
नहीं
'अशरफ़'
को
दुनिया
से
मोहब्बत
ये
दुनिया
से
किनारा
चाहता
है
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Meem Maroof Ashraf
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इतने
अच्छे
नहीं
थे
हम
लेकिन
तेरे
सब
आशिक़ों
से
बेहतर
थे
Meem Maroof Ashraf
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मोहब्बत
ही
मोहब्बत
का
बदल
थी
पुराने
दौर
में
पैसा
नहीं
था
Meem Maroof Ashraf
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अब
तो
वो
शख़्स
मिरा
कुछ
भी
नहीं
लगता
है
पर
ये
लगता
है
मुझे
कुछ
तो
मगर
लगता
है
Meem Maroof Ashraf
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इक
वही
सुब्ह-ओ-शाम
है
'क़ैसर'
और
क्या
तुझ
को
काम
है
'क़ैसर
अब
तो
बस
ख़ुद-कुशी
ही
रस्ता
है
और
वो
भी
हराम
है
'क़ैसर'
अब
यक़ीं
किस
पे
कीजिएगा
भला
हर
कोई
ख़ुश-कलाम
है
'क़ैसर'
हम
ने
चाहा
था
टूट
कर
उस
को
ख़ूब
ये
इत्तिहाम
है
'क़ैसर'
जिस
के
हर
शे'र
में
है
तू
पिंहाँ
उस
ही
शाइर
का
नाम
है
'क़ैसर'
बेशक
इंसान
है
ख़सारे
में
ये
ख़ुदा
का
कलाम
है
'क़ैसर'
देखो
जिस
ज़ाविये
से
दिल-कश
है
वो
तो
माह-ए-तमाम
है
'क़ैसर'
जब
से
देखा
है
वो
तन-ए-'उर्यां
हर
घड़ी
तिश्ना-काम
है
'क़ैसर'
जबकि
मुद्दत
से
मेरे
साथ
नहीं
क्यूँ
वो
फिर
हम-ख़िराम
है
'क़ैसर'
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Meem Maroof Ashraf
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