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Manish watan
zindagi zindagi men nahin ab
zindagi zindagi men nahin ab | ज़िंदगी ज़िंदगी में नहीं अब
- Manish watan
ज़िंदगी
ज़िंदगी
में
नहीं
अब
बात
वो
आशिक़ी
में
नहीं
अब
जान
तक
दे
गए
लोग
सोचो
प्यार
ऐसा
किसी
में
नहीं
अब
इक
नज़र
आसमाँ
पर
है
डाली
चाँद
ख़ुद
रौशनी
में
नहीं
अब
बाद
तेरे
सफ़र
छोड़
आए
देख
हम
उस
गली
में
नहीं
अब
जो
मिरा
नाच
कर
होश
खो
दे
दम
किसी
मोरनी
में
नहीं
अब
इश्क़
पर
इक
कहावत
लिखी
है
इश्क़
शामिल
ख़ुशी
में
नहीं
अब
ख़ुद
सभी
लोग
का
मसअला
है
ये
कमी
बस
हमीं
में
नहीं
अब
- Manish watan
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कीजे
इज़हार-ए-मोहब्बत
चाहे
जो
अंजाम
हो
ज़िंदगी
में
ज़िंदगी
जैसा
कोई
तो
काम
हो
Priyamvada ilhan
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है
सहज
स्वीकार
जो
जीवन
पे
वो
अपवाद
तुम
ज़िंदगी
अवसाद
है
अवसाद
में
उन्माद
तुम
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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दर्द
ऐसा
है
कि
जी
चाहे
है
ज़िंदा
रहिए
ज़िंदगी
ऐसी
कि
मर
जाने
को
जी
चाहे
है
Kaleem Aajiz
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ये
मेरी
ज़िद
ही
ग़लत
थी
कि
तुझ
सेा
बन
जाऊँ
मैं
अब
न
अपनी
तरह
हूँ
न
तेरे
जैसा
हूँ
हमारे
बीच
ज़माने
की
बदगुमानी
है
मैं
ज़िंदगी
से
ज़रा
कम
ही
बात
करता
हूँ
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Subhan Asad
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बहन
ने
बाँध
कर
राखी
बचा
ली
ज़िंदगी
वर्ना
ज़रा
सा
वक़्त
बाक़ी
था
हमारी
नब्ज़
थमने
में
Harsh saxena
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बद-हवा
सेी
है
बे-ख़याली
है
क्या
ये
हालत
भी
कोई
हालत
है
ज़िंदगी
से
है
जंग
शाम-ओ-सहर
मौत
से
शिकवा
है
शिकायत
है
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Chandan Sharma
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तुम्हारी
ज़िंदगी
में
तुम
हमेशा
मुझे
हर
आदमी
में
सुन
सकोगी
सुनोगी
जब
कभी
भी
शे'र
मेरे
तो
ख़ुद
को
शा'इरी
में
सुन
सकोगी
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Sanskar 'Sanam'
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ज़िंदगी
एक
कहानी
के
सिवा
कुछ
भी
नहीं
लोग
किरदार
निभाते
हुए
मर
जाते
हैं
Malikzada Javed
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शोर
की
इस
भीड़
में
ख़ामोश
तन्हाई
सी
तुम
ज़िन्दगी
है
धूप
तो
मद-मस्त
पुर्वाई
सी
तुम
चाहे
महफ़िल
में
रहूँ
चाहे
अकेले
में
रहूँ
गूँजती
रहती
हो
मुझ
में
शोख़
शहनाई
सी
तुम
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Kunwar Bechain
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किराए
के
घर
में
गई
ज़िन्दगी
कहाँ
ज़िन्दगी
में
रही
ज़िन्दगी
Umesh Maurya
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सभी
ज़ख़्म
मुरझा
गए
हैं
हमारे
कभी
भी
किसी
में
खिलेंगे
नहीं
हम
बता
कर
गया
है
खुले
ज़ख़्म
रखना
कभी
ज़ख़्म
अपने
सिलेंगे
नहीं
हम
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Manish watan
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तेरे
ख़ातिर
ज़िंदगानी
इक
काम
ज़रूरी
है
पत्थर
डूब
के
उछले
ऐसा
नाम
ज़रूरी
है
मुझको
करनी
है
मन
मानी
अपनी
ख़ूबी
पर
दोस्त
ख़ुदा
तक
जाना
ये
पैग़ाम
ज़रूरी
है
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Manish watan
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कुछ
पाने
के
लिए
निकला
हूॅं
अब
मैं
देखूॅंगा
खोना
क्या
होगा
मुझ
को
Manish watan
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साथ
मेरे
कभी
चला
होता
तो
तुझे
दर्द
का
पता
होता
ख़्वाब
टूटे
हुए
मिले
मुझको
काश
पहले
कभी
जगा
होता
मैं
न
होता
दुखी
बिछड़ने
पर
यार
दिल
से
गले
लगा
होता
देख
तेरे
क़दम
नहीं
बढ़ते
छोड़
जाना
अगर
सज़ा
होता
एक
ठोकर
लगी
मुझे
फिर
से
काश
पहला
निशाँ
मिटा
होता
फिर
कहीं
एक
रोज़
जीता
मैं
यार
थोड़ा
अगर
बचा
होता
मौत
का
है
'मनीष'
दुख
किसको
लाश
का
तो
अता-पता
होता
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Manish watan
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अब
लोगों
के
चेहरे
रंग
बदलते
हैं
आईना
कोई
हुशियार
नहीं
होता
उम्र
बितानी
पड़ती
है
इक
हाँ
के
लिए
बातों
से
कुछ
अपना
यार
नहीं
होता
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Manish watan
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