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Kabir Altamash
sabse pahle main aañkhen dekhoonga
sabse pahle main aañkhen dekhoonga | सब सेे पहले मैं आँखें देखूँगा
- Kabir Altamash
सब
सेे
पहले
मैं
आँखें
देखूँगा
तब
जा
कर
उनकी
बाहें
देखूँगा
मेरी
ग़ज़लें
ख़ारिज
करने
वाले
मैं
भी
अब
तेरी
ग़ज़लें
देखूंँगा
- Kabir Altamash
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मुझको
ये
नज़र
आया
के
वो
एक
बला
है
कुछ
ख़्वाब
है
कुछ
अस्ल
है
कुछ
तर्ज
-ए-
अदा
है
वो
ग़ैर
की
आग़ोश
में
रहने
लगा
शादाँ
उसको
नहीं
मालूम
के
दिल
मेरा
जला
है
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Navneet krishna
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ज़ख़्म
लगे
हैं
कितने
दिल
पर
याद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
शाद
नहीं
हूँ
मैं
तुमको
नाशाद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
उम्र
गए
पे
तेरी
सूरत
और
मिरी
आँखें
टकराईं
उम्र
गए
में
सोची
वो
फ़रियाद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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इक
गुल
के
मुरझाने
पर
क्या
गुलशन
में
कोहराम
मचा
इक
चेहरा
कुम्हला
जाने
से
कितने
दिल
नाशाद
हुए
Faiz Ahmad Faiz
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मुमकिन
है
कि
सदियों
भी
नज़र
आए
न
सूरज
इस
बार
अँधेरा
मिरे
अंदर
से
उठा
है
Aanis Moin
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साक़ी
कुछ
आज
तुझ
को
ख़बर
है
बसंत
की
हर
सू
बहार
पेश-ए-नज़र
है
बसंत
की
Ufuq Lakhnavi
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हम
तोहफ़े
में
घड़ियाँ
तो
दे
देते
हैं
एक
दूजे
को
वक़्त
नहीं
दे
पाते
हैं
आँखें
ब्लैक
एंड
व्हाइट
हैं
तो
फिर
इन
में
रंग
बिरंगे
ख़्वाब
कहाँ
से
आते
हैं?
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Fareeha Naqvi
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एक
ही
बार
नज़र
पड़ती
है
उन
पर
‘ताबिश’
और
फिर
वो
ही
लगातार
नज़र
आते
हैं
Zubair Ali Tabish
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नज़र
में
रखना
कहीं
कोई
ग़म
शनास
गाहक
मुझे
सुख़न
बेचना
है
ख़र्चा
निकालना
है
Umair Najmi
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ये
वो
क़बीला
है
जो
हुस्न
को
ख़ुदा
माने
यहाँ
पे
कौन
तेरी
बात
का
बुरा
माने
इशारा
कर
दिया
है
आपकी
तरफ़
मैंने
ये
बच्चे
पूछ
रहे
थे
कि
बे-वफ़ा
माने
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Kushal Dauneria
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जब
बुलंदी
का
गुमाँ
था
तो
नहीं
याद
आई
अपनी
परवाज़
से
टूटे
तो
ज़मीं
याद
आई
वही
आँखें
कि
जो
ईमान-शिकन
आँखें
हैं
उन्हीं
आँखों
की
हमें
दावत-ए-दीं
याद
आई
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Subhan Asad
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मुझको
ख़ुद
से
बहुत
डर
लगता
है
कोई
दिन
मार
न
डालूं
ख़ुद
को
Kabir Altamash
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जब
तेरे
बच्चे
मेरी
नज़्म
सुनाएंगे
तुझको
तब
तू
समझेगी
तूने
क्या
खोया
था
ऐ
लड़की
Kabir Altamash
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मैं
सोचता
था
तू
निभाएगा
मुझे
क्या
ही
पता
था
छोड़
जाएगा
मुझे
टूटा
हुआ
है
ख़ुद
यहाँ
वो
शख़्स
भी
अब
ख़ुद
बनेगा
या
बनाएगा
मुझे
अल्लाह
के
ही
हाथ
में
है
ये
हँसी
मैं
तब
हसूँगा
जब
हँसाएगा
मुझे
ऐ
बेरहम
मुझ
पर
तरस
खा
तू
ज़रा
ऐ
बेरहम
कितना
रुलाएगा
मुझे
उसने
कहा
है
कॉल
करना
रात
में
मालूम
है
ग़ज़लें
सुनाएगा
मुझे
महबूब
मेरा
मर
गया
अफ़सोस
है
उफ़
कौन
अब
आख़िर
सताएगा
मुझे
जिसको
हँसाने
में
लगी
हूँ
मैं
अभी
इक
दिन
वही
लड़का
रुलाएगा
मुझे
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Kabir Altamash
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थक
गए
हम
ज़िंदगी
से
जी
रहे
हैं
बेबसी
से
अब
पढ़ाई
ही
करूँगा
भर
गया
मन
आशिक़ी
से
दोस्त
तुम
सेे
पूछना
था
कुछ
मिला
क्या
दुश्मनी
से
हूँ
अकेला
ज़िंदगी
में
मुझको
क्या
है
फ़रवरी
से
जल
रहे
हैं
अबके
सारे
आदमी
ही
आदमी
से
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Kabir Altamash
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अब
उस
सेे
यार
हरगिज़
भी
किनारा
हो
नहीं
सकता
मगर
वो
शख़्स
तो
फिर
भी
हमारा
हो
नहीं
सकता
ये
कैसे
मान
बैठे
तुम
कि
वो
अब
भी
तुम्हारा
है
तुम्हारा
है
तो
फिर
वो
क्यूँ
तुम्हारा
हो
नहीं
सकता
मैं
जिसके
वास्ते
सब
भूल
बैठा
हूँ
वो
कहती
है
सुनो
लड़के
हमारा
अब
गुज़ारा
हो
नहीं
सकता
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Kabir Altamash
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