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Kabir Altamash
main sochta tha tu nibhaaega mujhe
main sochta tha tu nibhaaega mujhe | मैं सोचता था तू निभाएगा मुझे
- Kabir Altamash
मैं
सोचता
था
तू
निभाएगा
मुझे
क्या
ही
पता
था
छोड़
जाएगा
मुझे
टूटा
हुआ
है
ख़ुद
यहाँ
वो
शख़्स
भी
अब
ख़ुद
बनेगा
या
बनाएगा
मुझे
अल्लाह
के
ही
हाथ
में
है
ये
हँसी
मैं
तब
हसूँगा
जब
हँसाएगा
मुझे
ऐ
बेरहम
मुझ
पर
तरस
खा
तू
ज़रा
ऐ
बेरहम
कितना
रुलाएगा
मुझे
उसने
कहा
है
कॉल
करना
रात
में
मालूम
है
ग़ज़लें
सुनाएगा
मुझे
महबूब
मेरा
मर
गया
अफ़सोस
है
उफ़
कौन
अब
आख़िर
सताएगा
मुझे
जिसको
हँसाने
में
लगी
हूँ
मैं
अभी
इक
दिन
वही
लड़का
रुलाएगा
मुझे
- Kabir Altamash
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लड़ाई
है
तो
अच्छा
रात-भर
यूँँ
ही
बसर
कर
लो
हम
अपना
मुँह
इधर
कर
लें
तुम
अपना
मुँह
उधर
कर
लो
Muztar Khairabadi
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रात
बेचैन
सी
सर्दी
में
ठिठुरती
है
बहुत
दिन
भी
हर
रोज़
सुलगता
है
तिरी
यादों
से
Amit Sharma Meet
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क्या
बैठ
जाएँ
आन
के
नज़दीक
आप
के
बस
रात
काटनी
है
हमें
आग
ताप
के
कहिए
तो
आप
को
भी
पहन
कर
मैं
देख
लूँ
मा'शूक़
यूँँ
तो
हैं
ही
नहीं
मेरी
नाप
के
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Farhat Ehsaas
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किताबें,
रिसाले
न
अख़बार
पढ़ना
मगर
दिल
को
हर
रात
इक
बार
पढ़ना
Bashir Badr
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जिस
पर
हमारी
आँख
ने
मोती
बिछाए
रात
भर
भेजा
वही
काग़ज़
उसे
हम
ने
लिखा
कुछ
भी
नहीं
Bashir Badr
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ये
कहाँ
की
रीत
है
जागे
कोई
सोए
कोई
रात
सब
की
है
तो
सब
को
नींद
आनी
चाहिए
Madan Mohan Danish
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उस
के
ख़त
रात
भर
यूँँ
पढ़ता
हूँ
जैसे
कल
इम्तिहान
हो
मेरा
Zubair Ali Tabish
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इक
रात
वो
गया
था
जहाँ
बात
रोक
के
अब
तक
रुका
हुआ
हूँ
वहीं
रात
रोक
के
Farhat Ehsaas
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दिन
ढल
गया
और
रात
गुज़रने
की
आस
में
सूरज
नदी
में
डूब
गया,
हम
गिलास
में
Rahat Indori
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कुछ
लोग
ख़यालों
से
चले
जाएँ
तो
सोएँ
बीते
हुए
दिन
रात
न
याद
आएँ
तो
सोएँ
Habib Jalib
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तुम्हें
ये
जान
कर
शायद
ख़ुशी
होगी
तुम्हें
अब
छोड़ने
वाला
है
इक
लड़का
Kabir Altamash
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हम
दोनों
मिल
कर
इक
झगड़े
को
खींच
रहे
हैं
मतलब
हम
दोनों
इस
रिश्ते
को
खींच
रहे
हैं
डूब
गया
था
जो
बरसों
पहले
घर
वो
अपना
अब
उस
घर
के
हर
इक
मलबे
को
खींच
रहे
हैं
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Kabir Altamash
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अभी
भी
लौट
आओ
तुम
जहाँ
भी
हो
तुम्हारे
बिन
मेरी
दुनिया
अधूरी
है
Kabir Altamash
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वहीं
पर
इक
जवानी
चल
रही
है
जहाँ
कोई
जवानी
ढल
रही
है
मैं
हूँ
मिट्टी
मगर
हूँ
उसके
हाथों
मुझे
वो
अपने
हाथों
मल
रही
है
तुम्हें
अब
वास्ता
क्यूँ
होगा
हम
सेे
तुम्हारी
ज़िन्दगी
तो
चल
रही
है
मुझे
तुझ
सेे
मुहब्बत
गर
नहीं
थी
मुझे
तेरी
कमी
क्यूँ
खल
रही
है
उसे
कुछ
मत
कहो
मेरे
रक़ीबों
वो
मेरे
मस'अलों
का
हल
रही
है
ये
धोका
बे-वफ़ाई
और
नफ़रत
वो
हर
इक
काम
में
अव्वल
रही
है
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Kabir Altamash
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वो
मिले
तो
पूछना
उस
सेे
कभी
तुम
मेरे
चेहरे
की
चमक
क्यूँ
खा
गई
वो
Kabir Altamash
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