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Karal 'Maahi'
aa.e tujhe ghin dekh kar mujhko ki aise din nahin
aa.e tujhe ghin dekh kar mujhko ki aise din nahin | आए तुझे घिन देख कर मुझको कि ऐसे दिन नहीं
- Karal 'Maahi'
आए
तुझे
घिन
देख
कर
मुझको
कि
ऐसे
दिन
नहीं
मुश्किल
बहुत
हूँ
मैं
मगर
ऐ
यार
नामुमकिन
नहीं
- Karal 'Maahi'
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ग़ज़ल
पूरी
न
हो
चाहे,
मग़र
इतनी
सी
ख़्वाहिश
है
मुझे
इक
शे'र
कहना
है
तेरे
रुख़्सार
की
ख़ातिर
Siddharth Saaz
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दोनों
बिलकुल
झूठे
थे
दोनों
अब
तक
ज़िंदा
हैं
Sabeen Saif
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इश्क़
हुआ
है
क्या
तुझ
को
भी
तेरा
जो
होगा
सो
होगा
shaan manral
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सितारे
और
क़िस्मत
देख
कर
घर
से
निकलते
हैं
जो
बुज़दिल
हैं
मुहूरत
देखकर
घर
से
निकलते
हैं
हमें
लेकिन
सफ़र
की
मुश्किलों
से
डर
नहीं
लगता
कि
हम
बच्चों
की
सूरत
देखकर
घर
से
निकलते
हैं
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Abrar Kashif
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तुम
ने
स्वेटर
बुना
था
मिरे
नाम
का
मैं
भी
लाया
था
कुछ
सर्दियाँ
जंगली
Shakeel Azmi
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आए
थे
हँसते
खेलते
मय-ख़ाने
में
'फ़िराक़'
जब
पी
चुके
शराब
तो
संजीदा
हो
गए
Firaq Gorakhpuri
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प्यास
जहाँ
की
एक
बयाबाँ
तेरी
सख़ावत
शबनम
है
पी
के
उठा
जो
बज़्म
से
तेरी
और
भी
तिश्ना-काम
उठा
Ali Sardar Jafri
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गले
में
उस
के
ख़ुदा
की
अजीब
बरकत
है
वो
बोलता
है
तो
इक
रौशनी
सी
होती
है
Bashir Badr
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सीने
लगाऊँ
ग़ैर
को
तो
पूछता
है
दिल
किसकी
जगह
थी
और
ये
सीने
पे
कौन
है
Ankit Maurya
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अगर
मैं
कथा
का
क़लमकार
होता
यक़ीनन
ही
वो
तो
मिरा
यार
होता
लगाती
नहीं
हर
दफ़ा
वो
बहाने
लगा
लेती
सीने
से
गर
प्यार
होता
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Vijay Potter Singhadiya
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दिवानों
की
ये
बस्ती
है
दिवाने
ही
मिलेंगे
बस
बढ़ेगा
दर्द
जब
हद
से
कहेंगे
और
खुल
के
हँस
Karal 'Maahi'
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जिनको
न
शा'इरी
से
शग़फ़
है
न
राब्ता
है
कौन
इस
जहाँ
में
भला
उन
सा
बदनसीब
जब
जब
मुझे
लगी
मैं
लगा
और
काम
में
होगा
कोई
जहाँ
में
मिरी
धुन
सा
बदनसीब
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Karal 'Maahi'
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मैं
किसी
का
न
हुआ
जिनके
सिवा
वो
सभी
के
हैं
मगर
मेरे
सिवा
Karal 'Maahi'
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ज़रा
देख
अपने
क़लमकार
की
धूम
सुलभ
पैरहन
में
है
किरदार
की
धूम
मिरे
अलविदा
कहने
के
बाद
उट्ठी
उसी
बज़्म
में
मेरे
अश'आर
की
धूम
खड़ा
कर
कटहरे
में
दिल
पूछ
बैठा
मचाई
कभी
तुमने
बेकार
की
धूम
इक
अर्सा
हुआ
उसको
परदेस
में
कि
दिल
ने
मनाई
न
दीदार
की
धूम
दिवाने
कि
परवाने
जो
भी
कहो
तुम
समझते
नहीं
हैं
वो
दरबार
की
धूम
दिवाली
कि
रमज़ान
होली
हो
या
ईद
रही
ग़ैर-वाजिब
जमादार
की
धूम
किया
रक़्स
मुर्शिद
ने
ग़ज़लों
पे
मेरी
दिखी
आज
मुझको
इक
अनवार
की
धूम
नहीं
है
इबादत
से
वाबस्ता
माही
कलाम
उसका
है
इक
ख़तावार
की
धूम
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Karal 'Maahi'
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मुद्दत
हुई
कहा
न
कोई
शे'र
ख़ास-ओ-आम
गो
यूँँ
किया
कि
आज
ग़म-ए-इश्क़
कह
लिया
Karal 'Maahi'
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