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Karal 'Maahi'
Zra dekh apne qalamkar ki dhuum
ज़रा देख अपने क़लमकार की धूम
- Karal 'Maahi'
ज़रा
देख
अपने
क़लमकार
की
धूम
सुलभ
पैरहन
में
है
किरदार
की
धूम
मिरे
अलविदा
कहने
के
बाद
उट्ठी
उसी
बज़्म
में
मेरे
अश'आर
की
धूम
खड़ा
कर
कटहरे
में
दिल
पूछ
बैठा
मचाई
कभी
तुमने
बेकार
की
धूम
इक
अर्सा
हुआ
उसको
परदेस
में
कि
दिल
ने
मनाई
न
दीदार
की
धूम
दिवाने
कि
परवाने
जो
भी
कहो
तुम
समझते
नहीं
हैं
वो
दरबार
की
धूम
दिवाली
कि
रमज़ान
होली
हो
या
ईद
रही
ग़ैर-वाजिब
जमादार
की
धूम
किया
रक़्स
मुर्शिद
ने
ग़ज़लों
पे
मेरी
दिखी
आज
मुझको
इक
अनवार
की
धूम
नहीं
है
इबादत
से
वाबस्ता
माही
कलाम
उसका
है
इक
ख़तावार
की
धूम
- Karal 'Maahi'
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हुस्न
नसीहत
इश्क़
इबादत
मेरे
लिए
सौदाई
है
तुम
माहिर
हो
सब
में
जानाँ
ग़ज़ब
क़लंदरकारी
है
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जिनको
न
शा'इरी
से
शग़फ़
है
न
राब्ता
है
कौन
इस
जहाँ
में
भला
उन
सा
बदनसीब
जब
जब
मुझे
लगी
मैं
लगा
और
काम
में
होगा
कोई
जहाँ
में
मिरी
धुन
सा
बदनसीब
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घुटन
की
इन्तिहा
पर
पूछते
हैं
हाल
कैसा
है
कि
उनका
पूछना
यूँँ
हाल
भी
जंजाल
जैसा
है
हुनर
है
और
क़ाबिल
हो
मगर
क्या
ही
उखाड़ोगे
चलन
उसका
है
'माही'
आज
जिसके
पास
पैसा
है
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भुला
क्यूँँ
नहीं
पा
रहा
मैं
ख़ुदाया
नुमायाँ
वो
पिस्तान
उन
पर
मिरे
लब
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ईद
पर
दीद
तेरी
मिली
चाँद
को
तब
कहीं
चाँद
की
ईद
पूरी
हुई
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