yuñ aa ke shaam-e-dard b-rang-e-sehar gaii | यूँँ आ के शाम-ए-दर्द ब-रंग-ए-सहर गई

  - Kamal Jafari
यूँँकेशाम-ए-दर्दब-रंग-ए-सहरगई
चेहरेसेमेरेधूपग़मोंकीउतरगई
साइलकीतरहलोगसफ़ोंमेंखड़ेमिले
जिसरहगुज़ार-ए-ज़ीस्तपेमेरीनज़रगई
हमरह-रवान-ए-शौक़कीक़िस्मतपूछिए
मंज़िलजिसेभीसमझावोमंज़िलगुज़रगई
वोजान-ए-आरज़ूकिजोथीशम-ए-अंजुमन
दिलढूँढताहैउसकोजानेकिधरगई
इकशक्ल-ए-दिलरुबाजिसेदेखाथाख़्वाबमें
तस्वीरकीतरहमिरेदिलमेंउतरगई
जिसबज़्म-ए-दोस्ताँमेंसुनातेथेहमग़ज़ल
अफ़्सोससदअफ़्सोसवोमहफ़िलबिखरगई
अबकेबहारआईहैमानिंद-ए-आइना
देखा'कमाल'मैंनेतोसूरतनिखरगई
  - Kamal Jafari
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