suroor-o-kaif hai kuchh lazzat-e-baqa to nahin | सुरूर-ओ-कैफ़ है कुछ लज़्ज़त-ए-बक़ा तो नहीं

  - Kaleem Ahmadabadi
सुरूर-ओ-कैफ़हैकुछलज़्ज़त-ए-बक़ातोनहीं
येइब्तिदाकीहक़ीक़तहैइंतिहातोनहीं
सितारेतीरनिगाहोंसेदेखतेक्यूँँहैं
मिराजुनूँकोईमेरेलिएबलातोनहीं
फ़रेबखाएक्यूँँकरकिसीकासादादिल
ज़माना-साज़निगाहोंसेआश्नातोनहीं
कहींगिरीतोहैबिजलीज़रानज़रकीजे
किसीग़रीबकीपलटीहुईदु'आतोनहीं
हज़ारबारख़िज़ाँसेबहारटकराई
चमनकाराज़मगरआजतकखुलातोनहीं
मिज़ाज-ए-हुस्नमुकद्दरहैक्यूँँख़ुदाजाने
इसआइनेमेंकोईबालगयातोनहीं
हुजूम-ए-नाज़मेंजल्वा-फ़रेबियोंकेसिवा
'कलीम'औरकोईहादिसाहुआतोनहीं
  - Kaleem Ahmadabadi
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