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"Nadeem khan' Kaavish"
tere khaatir jahaan dooba
tere khaatir jahaan dooba | तेरे ख़ातिर जहाँ डूबा
- "Nadeem khan' Kaavish"
तेरे
ख़ातिर
जहाँ
डूबा
वो
दरिया
भी
किनारा
था
- "Nadeem khan' Kaavish"
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कोई
समुंदर,
कोई
नदी
होती
कोई
दरिया
होता
हम
जितने
प्यासे
थे
हमारा
एक
गिलास
से
क्या
होता
ताने
देने
से
और
हम
पे
शक
करने
से
बेहतर
था
गले
लगा
के
तुमने
हिजरत
का
दुख
बाट
लिया
होता
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Tehzeeb Hafi
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नदी
को
कोसते
हैं
सब
किसी
के
डूब
जाने
पर
नदी
में
डूबते
को
पर
कोई
तिनका
नहीं
देता
Alankrat Srivastava
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मुहब्बत
आपसे
करना
कभी
आसाँ
नहीं
था
पर
बिना
कश्ती
के
दरिया
पार
करना
शौक़
है
मेरा
Tanoj Dadhich
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तिरे
एहसास
में
डूबा
हुआ
मैं
कभी
सहरा
कभी
दरिया
हुआ
मैं
Siraj Faisal Khan
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ये
नदी
वर्ना
तो
कब
की
पार
थी
मेरे
रस्ते
में
अना
दीवार
थी
आप
को
क्या
इल्म
है
इस
बात
का
ज़िंदगी
मुश्किल
नहीं
दुश्वार
थी
थीं
कमानें
दुश्मनों
के
हाथ
में
और
मेरे
हाथ
में
तलवार
थी
जल
गए
इक
रोज़
सूरज
से
चराग़
रौशनी
को
रौशनी
दरकार
थी
आज
दुनिया
के
लबों
पर
मुहर
है
कल
तलक
हाँ
साहब-ए-गुफ़्तार
थी
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ARahman Ansari
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सदा
लपेट
के
दिल
जाएँगे
वगरना
नहीं
पहाड़
आह
से
हिल
जाएँगे
वगरना
नहीं
वो
आज
दरिया
से
लड़ने
की
ठान
कर
गए
थे
कहीं
किनारे
पे
मिल
जाएँगे
वगरना
नहीं
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Nadeem Bhabha
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जो
उस
तरफ़
से
इशारा
कभी
किया
उस
ने
मैं
डूब
जाऊंगा
दरिया
को
पार
करते
हुए
Ghulam Murtaza Rahi
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दरिया
की
वुसअतों
से
उसे
नापते
नहीं
तन्हाई
कितनी
गहरी
है
इक
जाम
भर
के
देख
Adil Mansuri
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ज़रा
पाने
की
चाहत
में
बहुत
कुछ
छूट
जाता
है
नदी
का
साथ
देता
हूँ
समुंदर
रूठ
जाता
है
Aalok Shrivastav
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मिल
जाऊँगा
दरिया
में
तो
हो
जाऊँगा
दरिया
सिर्फ़
इसलिए
क़तरा
हूँ
कि
मैं
दरिया
से
जुदा
हूँ
Nazeer Banarasi
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कोई
ख़ुशियाँ
कोई
ख़्वाहिश
तो
उल्फ़त
माँगता
कोई
किसी
पीपल
के
ज़रिये
से
भी
मन्नत
माँगता
कोई
अगर
आदम
को
ख़ुद
पे
इख़्तियार
आ
जाता
तो
मौला
न
दुनिया
में
कोई
आता
न
जन्नत
माँगता
कोई
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"Nadeem khan' Kaavish"
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"शहीद-ए-आज़म
भगतसिंह"
आँखों
में
वो
आँसू
नहीं
कुछ
ख़्वाब
सँजोया
करता
था
वतन
की
आज़ादी
के
ख़ातिर
खूनी
आँसू
रोया
करता
था
आज़ादी
का
दीवाना
था
वो
रगों
में
उबाल
खानदानी
था
जिसने
सबकुछ
लुटा
दिया
अपना
वो
वीर
भगत
बलिदानी
था
अंगारों
पर
चलकर
जिसने
एक
नई
राह
बनाई
थी
उस
मतवाले
शे'र
ने
क़सम
आज़ादी
की
खाई
थी
चाहे
उम्र
कम
रही
हो
लेकिन
वो
एक
लंबी
कहानी
था
जिसने
सबकुछ
लुटा
दिया
अपना
वो
वीर
भगत
बलिदानी
था
जिसके
दिल
में
सिर्फ़
और
सिर्फ़
इन्कलाब
की
आग
थी
आँखों
में
थी
जलती
ज्वाला
लिबास
जिसका
त्याग
थी
हर
दिल
में
निशाँ
छोड़
गया
वो
भारत
माँ
की
निशानी
था
जिसने
सबकुछ
लुटा
दिया
अपना
वो
वीर
भगत
बलिदानी
था
जब
तक
धरती-अम्बर
होंगे
मिट
न
सकेगा
नाम
तुम्हारा
भारत
का
हर
बच्चा-बच्चा
याद
रखेगा
काम
तुम्हारा
समुंदर
से
भी
गहरा
था
जो
ख़ुद
में
ही
एक
रवानी
था
जिसने
सबकुछ
लुटा
दिया
अपना
वो
वीर
भगत
बलिदानी
था
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"Nadeem khan' Kaavish"
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बात
ये
है
कि
अब
हर
बात
में
ही
मैं
मुस्कुराता
हूँ
लेकिन
ख़ुश
नहीं
होता
"Nadeem khan' Kaavish"
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ज़माने
की
बातें
न
करना
कभी
तुम
वगर्ना
ज़माना
भी
बातें
करेगा
"Nadeem khan' Kaavish"
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पंखे
से
लटकी
लाशों
ने
हँस
करके
यूँँ
कहा
तू
सोचता
ही
रह
गया,
हम
कर
गुज़र
गए
"Nadeem khan' Kaavish"
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