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Kaifi Azmi
jo vo mire na rahe main bhi kab kisi ka raha
jo vo mire na rahe main bhi kab kisi ka raha | जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा
- Kaifi Azmi
जो
वो
मिरे
न
रहे
मैं
भी
कब
किसी
का
रहा
बिछड़
के
उन
से
सलीक़ा
न
ज़िंदगी
का
रहा
लबों
से
उड़
गया
जुगनू
की
तरह
नाम
उस
का
सहारा
अब
मिरे
घर
में
न
रौशनी
का
रहा
गुज़रने
को
तो
हज़ारों
ही
क़ाफ़िले
गुज़रे
ज़मीं
पे
नक़्श-ए-क़दम
बस
किसी
किसी
का
रहा
- Kaifi Azmi
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गुमान
है
या
किसी
विश्वास
में
है
सभी
अच्छे
दिनों
की
आस
में
है
ये
कैसा
जश्न
है
घर
वापसी
का
अभी
तो
राम
ही
वनवास
में
है
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Azhar Iqbal
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कहाँ
रोते
उसे
शादी
के
घर
में
सो
इक
सूनी
सड़क
पर
आ
गए
हम
Shariq Kaifi
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जिसे
तुम
काट
आए
उस
शजर
को
ढूँढता
होगा
परिंदा
लौटकर
के
अपने
घर
को
ढूँढता
होगा
Bhaskar Shukla
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अजब
अंदाज़
से
ये
घर
गिरा
है
मिरा
मलबा
मिरे
ऊपर
गिरा
है
Aanis Moin
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समझ
के
आग
लगाना
हमारे
घर
में
तुम
हमारे
घर
के
बराबर
तुम्हारा
भी
घर
है
Hafeez Banarasi
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अभी
ज़िंदा
है
माँ
मेरी
मुझे
कुछ
भी
नहीं
होगा
मैं
घर
से
जब
निकलता
हूँ
दु'आ
भी
साथ
चलती
है
Munawwar Rana
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तू
अपने
घर
में
मुहब्बत
की
जीत
पर
ख़ुश
है
अभी
ठहर
के
मेरा
ख़ानदान
बाक़ी
है
Siraj Faisal Khan
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सफ़र
के
बाद
भी
ज़ौक़-ए-सफ़र
न
रह
जाए
ख़याल
ओ
ख़्वाब
में
अब
के
भी
घर
न
रह
जाए
Abhishek shukla
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आप
क्या
आए
कि
रुख़्सत
सब
अंधेरे
हो
गए
इस
क़दर
घर
में
कभी
भी
रौशनी
देखी
न
थी
Hakeem Nasir
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एक
मुद्दत
से
हैं
सफ़र
में
हम
घर
में
रह
कर
भी
जैसे
बेघर
से
Azhar Iqbal
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कोई
तो
सूद
चुकाए
कोई
तो
ज़िम्मा
ले
उस
इंक़लाब
का
जो
आज
तक
उधार
सा
है
Kaifi Azmi
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ग़ुर्बत
की
ठंडी
छाँव
में
याद
आई
उस
की
धूप
क़द्र-ए-वतन
हुई
हमें
तर्क-ए-वतन
के
बाद
Kaifi Azmi
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मुद्दत
के
बाद
उस
ने
जो
की
लुत्फ़
की
निगाह
जी
ख़ुश
तो
हो
गया
मगर
आँसू
निकल
पड़े
Kaifi Azmi
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ख़ार-ओ-ख़स
तो
उठें
रास्ता
तो
चले
मैं
अगर
थक
गया
क़ाफ़िला
तो
चले
चाँद
सूरज
बुज़ुर्गों
के
नक़्श-ए-क़दम
ख़ैर
बुझने
दो
उन
को
हवा
तो
चले
हाकिम-ए-शहर
ये
भी
कोई
शहर
है
मस्जिदें
बंद
हैं
मय-कदा
तो
चले
उस
को
मज़हब
कहो
या
सियासत
कहो
ख़ुद-कुशी
का
हुनर
तुम
सिखा
तो
चले
इतनी
लाशें
मैं
कैसे
उठा
पाऊँगा
आप
ईंटों
की
हुरमत
बचा
तो
चले
बेलचे
लाओ
खोलो
ज़मीं
की
तहें
मैं
कहाँ
दफ़्न
हूँ
कुछ
पता
तो
चले
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Kaifi Azmi
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हाथ
आ
कर
लगा
गया
कोई
मेरा
छप्पर
उठा
गया
कोई
लग
गया
इक
मशीन
में
मैं
भी
शहर
में
ले
के
आ
गया
कोई
मैं
खड़ा
था
कि
पीठ
पर
मेरी
इश्तिहार
इक
लगा
गया
कोई
ये
सदी
धूप
को
तरसती
है
जैसे
सूरज
को
खा
गया
कोई
ऐसी
महँगाई
है
कि
चेहरा
भी
बेच
के
अपना
खा
गया
कोई
अब
वो
अरमान
हैं
न
वो
सपने
सब
कबूतर
उड़ा
गया
कोई
वो
गए
जब
से
ऐसा
लगता
है
छोटा
मोटा
ख़ुदा
गया
कोई
मेरा
बचपन
भी
साथ
ले
आया
गाँव
से
जब
भी
आ
गया
कोई
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Kaifi Azmi
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