कभीगिर्यांकभीख़ंदाँकभीहैराँहूँमैं
मुख़्तसरहैमिरीरूदादकिइंसाँहूँमैं
सहन-ए-गुलशनसेमिरीख़ाक-ए-नशेमननउड़ा
ऐसबामहरम-ए-असरार-ए-गुलिस्ताँहूँमैं
यूँँमुझेदिलसेफ़रामोशकिएबैठेहैं
जैसेउनकाहीकोईख़्वाब-ए-परेशाँहूँमैं
देकेग़मआपनेतकमील-ए-जुनूँभीतोनकी
सोचिएकबसेयूँँहीचाक-ए-गरेबाँहूँमैं
बज़्म-ए-कौनैनमेंअबतकमह-ओ-ख़ुर्शीदसही
उनकीमहफ़िलमेंचराग़-ए-तह-ए-दामाँहूँमैं
दिलकोउम्मीद-ए-करमरखतीहैमुज़्तरया'नी
येभीइकहुस्न-ए-तलबहैकिपरेशाँहूँमैं
मुझकोशर्मिंदानकरमुझसेइकआँसूभीनमाँग
ऐग़म-ए-दोस्तबहुतबे-सर-ओ-सामाँहूँमैं
येमिराहालहैनालाभीनहींकरसकता
औरमिराज़र्फ़भीदेखोकिग़ज़ल-ख़्वाँहूँमैं
'कैफ़'इसहालमेंहैंआज-कलइंसाँकिमुझे
शर्मआतीहैयेकहतेहुएइंसाँहूँमैं