sochta hooñ | सोचता हूँ

  - Kaif Ahmad Siddiqui
सोचताहूँ
वक़्तकीगर्दनपकड़कर
रेशमीस्कार्फ़काफंदालगाकर
खींचलूँ
औरइतनीज़ोरसेचीख़ूँ
ज़मींसे
आसमाँतक
सिर्फ़मेरीचीख़हीकाशोरगूँजे
वक़्तकीमरतीहुईआवाज़कोईसुनपाए
सोचताहूँ
वुसअत-ए-आफ़ाक़मेंपर्वाज़करके
रातकीआँखोंमेंतारीकीकापर्दाडालकरमैं
चाँदतारोंकोचुरालाऊँज़मींपर
औरथोड़ीदेर
बच्चोंकीतरहख़ुशहोकेखेलूँ
खेलनेसेभीजबअपनादिलबहले
एकपत्थरपरपटख़कर
हरखिलौनेकोमैंचकना-चूरकरदूँ
सोचताहूँ
आसमाँसेछीनकर
जलतेहुएसूरजकीथाली
एककश्तीकीतरह
गहरेसमुंदरमेंचलाऊँ
औरउसपरसारीदुनियाकोबिठाकर
ग़र्क़करदूँ
सोचताहूँ
सोचतेहीसोचते
मैंख़ुदहीइकदिन
सोचकेआतिश-कदामेंजलजाऊँ
  - Kaif Ahmad Siddiqui
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy