har ek gaam pe ranj-e-safar uthaate hue | हर एक गाम पे रंज-ए-सफ़र उठाते हुए

  - Kaami Shah
हरएकगामपेरंज-ए-सफ़रउठातेहुए
मैंपड़ाहूँयहाँतुझसेदूरजातेहुए
अजीबआगथीजिसनेमुझेफ़रोग़दिया
इकइंतिज़ारमेंरक्खेदिएजलातेहुए
तवीलरातसेहोताहैबरसर-ए-पैकार
सोचाकतेज़हुआहैमुझेबनातेहुए
येतेज़-गामी-ए-सहराअलगमिज़ाजकीहै
जोमुझसेभागरहीहैक़रीबआतेहुए
हैएकशोर-ए-गुज़िश्तामिरेतआक़ुबमें
मैंसुनरहाहूँजिसेअपनेपारआतेहुए
शरीक-ए-आतिशआब-ओ-हवाख़ाकरहे
मिरेअनासिर-ए-तरतीबशक्लपातेहुए
बहुतक़रीबसेगुज़रीहैवोनवा-ए-सफ़ेद
मिरेहवासेकानीलाधुआँउड़ातेहुए
मैंइम्तिज़ाज-ए-क़दीम-ओ-जदीदहूँ'कामी'
सोइस्म-ए-अस्रहीपढ़नामुझेबुलातेहुए
  - Kaami Shah
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