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Jaun Elia
kaam ki baat main ne ki hi nahin
kaam ki baat main ne ki hi nahin | काम की बात मैं ने की ही नहीं
- Jaun Elia
काम
की
बात
मैं
ने
की
ही
नहीं
ये
मिरा
तौर-ए-ज़िंदगी
ही
नहीं
ऐ
उमीद
ऐ
उमीद-ए-नौ-मैदां
मुझ
से
मय्यत
तिरी
उठी
ही
नहीं
मैं
जो
था
उस
गली
का
मस्त-ए-ख़िराम
उस
गली
में
मिरी
चली
ही
नहीं
ये
सुना
है
कि
मेरे
कूच
के
बा'द
उस
की
ख़ुश्बू
कहीं
बसी
ही
नहीं
थी
जो
इक
फ़ाख़्ता
उदास
उदास
सुब्ह
वो
शाख़
से
उड़ी
ही
नहीं
मुझ
में
अब
मेरा
जी
नहीं
लगता
और
सितम
ये
कि
मेरा
जी
ही
नहीं
वो
जो
रहती
थी
दिल-मोहल्ले
में
फिर
वो
लड़की
मुझे
मिली
ही
नहीं
जाइए
और
ख़ाक
उड़ाइए
आप
अब
वो
घर
क्या
कि
वो
गली
ही
नहीं
हाए
वो
शौक़
जो
नहीं
था
कभी
हाए
वो
ज़िंदगी
जो
थी
ही
नहीं
- Jaun Elia
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लोग
कहते
हैं
कि
इस
खेल
में
सर
जाते
हैं
इश्क़
में
इतना
ख़सारा
है
तो
घर
जाते
हैं
Shakeel Jamali
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सब
कुछ
तो
है
क्या
ढूँडती
रहती
हैं
निगाहें
क्या
बात
है
मैं
वक़्त
पे
घर
क्यूँँ
नहीं
जाता
Nida Fazli
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पास
मैं
जिसके
हूँ
वो
फिर
भी,
अच्छा
लड़का
ढूँढ़
रही
है
उसने
लगा
रक्खा
है
चश्मा,
और
वो
चश्मा
ढूँढ़
रही
है
फ़ोन
किया
मैंने
और
पूछा,
अब
तक
घर
से
क्यूँँ
नहीं
निकली
उस
ने
कहा
मुझ
सेे
मिलने
का,
एक
बहाना
ढूँढ़
रही
है
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Tanoj Dadhich
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अभी
ज़िंदा
है
माँ
मेरी
मुझे
कुछ
भी
नहीं
होगा
मैं
घर
से
जब
निकलता
हूँ
दु'आ
भी
साथ
चलती
है
Munawwar Rana
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हसीन
यादों
के
चाँद
को
अलविदा'अ
कह
कर
मैं
अपने
घर
के
अँधेरे
कमरों
में
लौट
आया
Hasan Abbasi
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रोज़
ढक
लेती
थी
नीला
जिस्म
अपना
शुक्र
है
आ
गई
बाहर
घर
की
बातें
Parul Singh "Noor"
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अच्छे
हो
कर
लौट
गए
सब
घर
लेकिन
मौत
का
चेहरा
याद
रहा
बीमारों
को
Shariq Kaifi
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तेरी
यादें
लिपट
जाती
हैं
मुझ
से
घर
पहुँचते
ही
कि
जैसे
बाप
से
आकर
कोई
बच्ची
लिपटती
है
Afzal Ali Afzal
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कुछ
भी
नहीं
तो
पेड़
की
तस्वीर
ही
सही
घर
में
थोड़ी
बहुत
तो
हरियाली
चाहिये
Himanshu Kiran Sharma
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कहाँ
रोते
उसे
शादी
के
घर
में
सो
इक
सूनी
सड़क
पर
आ
गए
हम
Shariq Kaifi
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क्या
तकल्लुफ़
करें
ये
कहने
में
जो
भी
ख़ुश
है
हम
उस
से
जलते
हैं
Jaun Elia
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इक
महक
सिम्त
ए
दिल
से
आई
थी
मैं
ये
समझा
तेरी
सवारी
है
Jaun Elia
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अब
मेरी
कोई
ज़िंदगी
ही
नहीं
अब
भी
तुम
मेरी
ज़िंदगी
हो
क्या
Jaun Elia
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घर
से
हम
घर
तलक
गए
होंगे
अपने
ही
आप
तक
गए
होंगे
हम
जो
अब
आदमी
हैं
पहले
कभी
जाम
होंगे
छलक
गए
होंगे
वो
भी
अब
हम
से
थक
गया
होगा
हम
भी
अब
उस
से
थक
गए
होंगे
शब
जो
हम
से
हुआ
मुआ'फ़
करो
नहीं
पी
थी
बहक
गए
होंगे
कितने
ही
लोग
हिर्स-ए-शोहरत
में
दार
पर
ख़ुद
लटक
गए
होंगे
शुक्र
है
इस
निगाह-ए-कम
का
मियाँ
पहले
ही
हम
खटक
गए
होंगे
हम
तो
अपनी
तलाश
में
अक्सर
अज़
समा-ता-समक
गए
होंगे
उस
का
लश्कर
जहां-त
हाँ
या'नी
हम
भी
बस
बे-कुमक
गए
होंगे
'जौन'
अल्लाह
और
ये
आलम
बीच
में
हम
अटक
गए
होंगे
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Jaun Elia
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हैं
बाशिंदे
उसी
बस्ती
के
हम
भी
सो
ख़ुद
पर
भी
भरोसा
क्यूँ
करें
हम
Jaun Elia
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