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Afzal Ali Afzal
teri yaaden lipt jaati hain mujh se ghar pahunchte hi
teri yaaden lipt jaati hain mujh se ghar pahunchte hi | तेरी यादें लिपट जाती हैं मुझ से घर पहुँचते ही
- Afzal Ali Afzal
तेरी
यादें
लिपट
जाती
हैं
मुझ
से
घर
पहुँचते
ही
कि
जैसे
बाप
से
आकर
कोई
बच्ची
लिपटती
है
- Afzal Ali Afzal
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हम
ऐसी
कुल
किताबें
क़ाबिल-ए-ज़ब्ती
समझते
हैं
कि
जिन
को
पढ़
के
लड़के
बाप
को
ख़ब्ती
समझते
हैं
Akbar Allahabadi
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सुब्ह
सवेरे
नंगे
पाँव
घास
पे
चलना
ऐसा
है
जैसे
बाप
का
पहला
बोसा
क़ुर्बत
जैसे
माँओं
की
Hammad Niyazi
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मैं
अपने
बाप
के
सीने
से
फूल
चुनता
हूँ
सो
जब
भी
साँस
थमी
बाग़
में
टहल
आया
Hammad Niyazi
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सभी
का
ख़ून
है
शामिल
यहाँ
की
मिट्टी
में
किसी
के
बाप
का
हिन्दुस्तान
थोड़ी
है
Rahat Indori
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इन
का
उठना
नहीं
है
हश्र
से
कम
घर
की
दीवार
बाप
का
साया
Unknown
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और
फिर
एक
दिन
बैठे
बैठे
मुझे
अपनी
दुनिया
बुरी
लग
गई
जिसको
आबाद
करते
हुए
मेरे
मां-बाप
की
ज़िंदगी
लग
गई
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Tehzeeb Hafi
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किस
शफ़क़त
में
गुँधे
हुए
मौला
माँ
बाप
दिए
कैसी
प्यारी
रूहों
को
मेरी
औलाद
किया
Anjum Saleemi
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माँ
की
दु'आ
न
बाप
की
शफ़क़त
का
साया
है
आज
अपने
साथ
अपना
जनम
दिन
मनाया
है
Anjum Saleemi
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हड्डियाँ
बाप
की
गूदे
से
हुई
हैं
ख़ाली
कम
से
कम
अब
तो
ये
बेटे
भी
कमाने
लग
जाएँ
Rauf Khair
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बीस
बरस
तक
बाप
उधड़ता
है
थोड़ा
थोड़ा
तब
सिलता
है
इक
बेटी
की
शादी
का
जोड़ा
Tanoj Dadhich
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तेरे
आने
की
आस
कर
रहे
हैं
और
ख़ुद
को
उदास
कर
रहे
हैं
हम
तेरे
इंतिज़ार
में
कब
से
जाने
क्या
क्या
क़यास
कर
रहे
हैं
ख़ुश्क़
सहरा
में
कुछ
दिवाने
लोग
यहाँ
वाँ
प्यास
प्यास
कर
रहे
हैं
फिर
यक़ीं
कर
रहे
हैं
सब
उस
पे
और
ब-होश-ओ-हवा
से
कर
रहे
हैं
फ़र्ज़
ये
है
कि
कुछ
ज़ियादा
दें
हम
मगर
सौ
पचास
कर
रहे
हैं
सब
मोहब्बत
के
नाम
पर
अफ़ज़ल
जिस्म
को
बे
लिबास
कर
रहे
हैं
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Afzal Ali Afzal
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हर
कोई
सब्र
की
तलक़ीन
किया
करता
है
पर
कोई
ये
तो
बताए
कि
करूँँ
मैं,
कैसे?
Afzal Ali Afzal
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इक
और
इश्क़
की
नहीं
फुर्सत
मुझे
सनम
और
हो
भी
अब
अगर
तो
मेरा
मन
नहीं
बचा
Afzal Ali Afzal
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सीने
में
मेरे
दिल
है,
पर
अब
उस
में
तू
नहीं
यानी
तिजोरी
तो
है
मगर
धन
नहीं
बचा
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Afzal Ali Afzal
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वक़्त
कैसे
वो
काटता
होगा
ग़म
ये
उस
को
भी
खा
रहा
होगा
हिज्र
की
रात
फिर
नहीं
कटती
आज
फिर
यानी
रत
जगा
होगा
तुझ
को
हँस-हँस
के
याद
करता
हूँ
कोई
मुझ
सा
भी
याँ
बता
होगा
शबे
ज़ुल्मत
में
रौशनी
के
लिए
सिर्फ़
मुफ़लिस
का
घर
जला
होगा
अपने
हाथों
में
थाम
कर
चेहरा
क्या
जबीं
वो
भी
चूमता
होगा?
उसको
पहरों
यूँँ
याद
करने
से
ज़ख़्म-ए-दिल
और
भी
हरा
होगा
ज़ात
मज़हब
को
छोड़
कर
अफ़ज़ल
क्या
कभी
भी
कोई
मिरा
होगा?
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Afzal Ali Afzal
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