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Jaun Elia
apni manzil ka raasta bhejo
apni manzil ka raasta bhejo | अपनी मंज़िल का रास्ता भेजो
- Jaun Elia
अपनी
मंज़िल
का
रास्ता
भेजो
जान
हम
को
वहाँ
बुला
भेजो
क्या
हमारा
नहीं
रहा
सावन
ज़ुल्फ़
याँ
भी
कोई
घटा
भेजो
नई
कलियाँ
जो
अब
खिली
हैं
वहाँ
उन
की
ख़ुश्बू
को
इक
ज़रा
भेजो
हम
न
जीते
हैं
और
न
मरते
हैं
दर्द
भेजो
न
तुम
दवा
भेजो
धूल
उड़ती
है
जो
उस
आँगन
में
उस
को
भेजो
सबा
सबा
भेजो
ऐ
फकीरो
गली
के
उस
गुल
की
तुम
हमें
अपनी
ख़ाक-ए-पा
भेजो
शफ़क़-ए-शाम-ए-हिज्र
के
हाथों
अपनी
उतरी
हुई
क़बा
भेजो
कुछ
तो
रिश्ता
है
तुम
से
कम-बख़्तों
कुछ
नहीं
कोई
बद-दुआ'
भेजो
- Jaun Elia
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ये
हवा
सारे
चराग़ों
को
उड़ा
ले
जाएगी
रात
ढलने
तक
यहाँ
सब
कुछ
धुआँ
हो
जाएगा
Naseer Turabi
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किसी
ने
प्यार
जताया
जता
के
छोड़
दिया
हवा
में
मुझको
उठाया
उठा
के
छोड़
दिया
किसे
सिखा
रहे
हो
इश्क़
तुम
नए
लड़के
ये
राग
हमने
मियाँ
गा
बजा
के
छोड़
दिया
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Vishnu virat
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न
रूई
हो
तो
अपने
अश्कों
से
बाती
बनाएँगे
बुझा
दीया
हमारा
तो
हवा
से
लड़
भी
जाएँगे
बनाई
रोज़
चौदह
साल
रंगोली
बस
इस
ख़ातिर
न
जाने
रामजी
वनवास
से
कब
लौट
आएंँगे
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Krishnakant Kabk
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देख
तो
दिल
कि
जाँ
से
उठता
है
ये
धुआँ
सा
कहाँ
से
उठता
है
गोर
किस
दिलजले
की
है
ये
फ़लक
शोला
इक
सुब्ह
यां
से
उठता
है
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Meer Taqi Meer
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क़सम
देता
है
बच्चों
की,
बहाने
से
बुलाता
है
धुआँ
चिमनी
का
हमको
कारख़ाने
से
बुलाता
है
Munawwar Rana
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रो
रहा
था
गोद
में
अम्माँ
की
इक
तिफ़्ल-ए-हसीं
इस
तरह
पलकों
पे
आँसू
हो
रहे
थे
बे-क़रार
जैसे
दीवाली
की
शब
हल्की
हवा
के
सामने
गाँव
की
नीची
मुंडेरों
पर
चराग़ों
की
क़तार
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Ehsan Danish
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हवा
को
ख़रीद'ने
के
लाले
पडे
हैं
हमारे
कयामत
से
पाले
पड़े
हैं
Amol
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सिगरेट
जिसे
सुलगता
हुआ
कोई
छोड़
दे
उस
का
धुआँ
हूँ
और
परेशाँ
धुआँ
हूँ
मैं
Ameeq Hanafi
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नए
दौर
के
नए
ख़्वाब
हैं
नए
मौसमों
के
गुलाब
हैं
ये
मोहब्बतों
के
चराग़
हैं
इन्हें
नफ़रतों
की
हवा
न
दे
Bashir Badr
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मिरे
सूरज
आ!
मिरे
जिस्म
पे
अपना
साया
कर
बड़ी
तेज़
हवा
है
सर्दी
आज
ग़ज़ब
की
है
Shahryar
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मर
चुका
है
दिल
मगर
ज़िंदा
हूँ
मैं
ज़हर
जैसी
कुछ
दवाएँ
चाहिए
पूछते
हैं
आप
आप
अच्छे
तो
हैं
जी
मैं
अच्छा
हूँ
दुआएँ
चाहिए
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Jaun Elia
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हम
को
यारों
ने
याद
भी
न
रखा
'जौन'
यारों
के
यार
थे
हम
तो
Jaun Elia
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सर
ही
अब
फोड़िए
नदामत
में
नींद
आने
लगी
है
फ़ुर्क़त
में
हैं
दलीलें
तिरे
ख़िलाफ़
मगर
सोचता
हूँ
तिरी
हिमायत
में
रूह
ने
इश्क़
का
फ़रेब
दिया
जिस्म
को
जिस्म
की
अदावत
में
अब
फ़क़त
आदतों
की
वर्ज़िश
है
रूह
शामिल
नहीं
शिकायत
में
इश्क़
को
दरमियाँ
न
लाओ
कि
मैं
चीख़ता
हूँ
बदन
की
उसरत
में
ये
कुछ
आसान
तो
नहीं
है
कि
हम
रूठते
अब
भी
हैं
मुरव्वत
में
वो
जो
ता'मीर
होने
वाली
थी
लग
गई
आग
उस
इमारत
में
ज़िंदगी
किस
तरह
बसर
होगी
दिल
नहीं
लग
रहा
मोहब्बत
में
हासिल-ए-कुन
है
ये
जहान-ए-ख़राब
यही
मुमकिन
था
इतनी
उजलत
में
फिर
बनाया
ख़ुदा
ने
आदम
को
अपनी
सूरत
पे
ऐसी
सूरत
में
और
फिर
आदमी
ने
ग़ौर
किया
छिपकिली
की
लतीफ़
सनअ'त
में
ऐ
ख़ुदा
जो
कहीं
नहीं
मौजूद
क्या
लिखा
है
हमारी
क़िस्मत
में
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Jaun Elia
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अब
मेरी
कोई
ज़िंदगी
ही
नहीं
अब
भी
तुम
मेरी
ज़िंदगी
हो
क्या
Jaun Elia
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आज
का
दिन
भी
ऐश
से
गुज़रा
सर
से
पाँव
तक
बदन
सलामत
है
Jaun Elia
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