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Jaun Elia
abhii ik shor sa utha hai kahii
abhii ik shor sa utha hai kahii | अभी इक शोर सा उठा है कहीं
- Jaun Elia
अभी
इक
शोर
सा
उठा
है
कहीं
कोई
ख़ामोश
हो
गया
है
कहीं
है
कुछ
ऐसा
कि
जैसे
ये
सब
कुछ
इस
से
पहले
भी
हो
चुका
है
कहीं
तुझ
को
क्या
हो
गया
कि
चीज़ों
को
कहीं
रखता
है
ढूँढता
है
कहीं
जो
यहाँ
से
कहीं
न
जाता
था
वो
यहाँ
से
चला
गया
है
कहीं
आज
शमशान
की
सी
बू
है
यहाँ
क्या
कोई
जिस्म
जल
रहा
है
कहीं
हम
किसी
के
नहीं
जहाँ
के
सिवा
ऐसी
वो
ख़ास
बात
क्या
है
कहीं
तू
मुझे
ढूँड
मैं
तुझे
ढूँडूँ
कोई
हम
में
से
रह
गया
है
कहीं
कितनी
वहशत
है
दरमियान-ए-हुजूम
जिस
को
देखो
गया
हुआ
है
कहीं
मैं
तो
अब
शहर
में
कहीं
भी
नहीं
क्या
मिरा
नाम
भी
लिखा
है
कहीं
इसी
कमरे
से
कोई
हो
के
विदाअ'
इसी
कमरे
में
छुप
गया
है
कहीं
मिल
के
हर
शख़्स
से
हुआ
महसूस
मुझ
से
ये
शख़्स
मिल
चुका
है
कहीं
- Jaun Elia
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तेरी
गली
को
छोड़
के
पागल
नहीं
गया
रस्सी
तो
जल
गई
है
मगर
बल
नहीं
गया
मजनूँ
की
तरह
छोड़ा
नहीं
मैं
ने
शहर
को
या'नी
मैं
हिज्र
काटने
जंगल
नहीं
गया
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Ismail Raaz
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हमारी
मुस्कुराहट
लाज़िमी
है
कि
हम
उनकी
गली
से
आ
रहे
हैं
Bhaskar Shukla
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तुम्हें
मैं
क्या
बताऊँ
इस
शहर
का
हाल
कैसा
है
यहाँ
बारिश
तो
होती
है
मगर
सावन
नहीं
आता
Bhaskar Shukla
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सदियों
से
किनारे
पे
खड़ा
सूख
रहा
है
इस
शहर
को
दरिया
में
गिरा
देना
चाहिए
Mohammad Alvi
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जि
यूँँगी
किस
तरह
तेरे
बिना
मत
फिक्र
कर
इसकी
गुज़रती
जिस
शहरस
हूँ
दिवाने
छोड़
आती
हूँ
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Parul Singh "Noor"
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जो
सुनते
हैं
कि
तिरे
शहर
में
दसहरा
है
हम
अपने
घर
में
दिवाली
सजाने
लगते
हैं
Jamuna Parsad Rahi
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इस
शहर
में
जीने
के
अंदाज़
निराले
हैं
होंटों
पे
लतीफ़े
हैं
आवाज़
में
छाले
हैं
Javed Akhtar
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ग़नीमत
है
नगर
वालों
लुटेरों
से
लुटे
हो
तुम
हमें
तो
गांव
में
अक्सर,
दरोगा
लूट
जाता
है
Aalok Shrivastav
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लकीरें
खींच
के
मिट्टी
पे
बैठ
जाता
हूँ
यहाँ
मकाँ
था,
ये
बाज़ार,
ये
गली
उस
की
Ashraf Yousafi
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ये
मयकशों
का
तवाज़ुन
भी
क्या
तवाज़ुन
है
खड़े
भी
रहना
सहूलत
से
लड़खड़ाना
भी
हमारे
शहर
के
लोगों
को
ख़ूब
आता
है
किसी
को
सर
पे
बिठाना
भी
और
गिराना
भी
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Imran Aami
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जो
गुज़ारी
न
जा
सकी
हम
से
हम
ने
वो
ज़िन्दगी
गुज़ारी
है
Jaun Elia
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अब
मैं
सारे
जहाँ
में
हूँ
बदनाम
अब
भी
तुम
मुझको
जानती
हो
क्या
Jaun Elia
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हम
वो
हैं
जो
ख़ुदा
को
भूल
गए
तुम
मेरी
जान
किस
गुमान
में
हो
Jaun Elia
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आप
अपने
से
हम-सुख़न
रहना
हमनशीं
साँस
फूल
जाती
है
Jaun Elia
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सर
ही
अब
फोड़िए
नदामत
में
नींद
आने
लगी
है
फ़ुर्क़त
में
हैं
दलीलें
तिरे
ख़िलाफ़
मगर
सोचता
हूँ
तिरी
हिमायत
में
रूह
ने
इश्क़
का
फ़रेब
दिया
जिस्म
को
जिस्म
की
अदावत
में
अब
फ़क़त
आदतों
की
वर्ज़िश
है
रूह
शामिल
नहीं
शिकायत
में
इश्क़
को
दरमियाँ
न
लाओ
कि
मैं
चीख़ता
हूँ
बदन
की
उसरत
में
ये
कुछ
आसान
तो
नहीं
है
कि
हम
रूठते
अब
भी
हैं
मुरव्वत
में
वो
जो
ता'मीर
होने
वाली
थी
लग
गई
आग
उस
इमारत
में
ज़िंदगी
किस
तरह
बसर
होगी
दिल
नहीं
लग
रहा
मोहब्बत
में
हासिल-ए-कुन
है
ये
जहान-ए-ख़राब
यही
मुमकिन
था
इतनी
उजलत
में
फिर
बनाया
ख़ुदा
ने
आदम
को
अपनी
सूरत
पे
ऐसी
सूरत
में
और
फिर
आदमी
ने
ग़ौर
किया
छिपकिली
की
लतीफ़
सनअ'त
में
ऐ
ख़ुदा
जो
कहीं
नहीं
मौजूद
क्या
लिखा
है
हमारी
क़िस्मत
में
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Jaun Elia
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